सिर्फ निजी जांचकर्ता की रिपोर्ट से ड्राइविंग लाइसेंस फर्जी नहीं माना जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल किसी निजी जांचकर्ता की रिपोर्ट के आधार पर बीमा कंपनी यह दावा नहीं कर सकती कि दुर्घटना करने वाले वाहन चालक का ड्राइविंग लाइसेंस फर्जी था। यदि बीमा कंपनी इस आधार पर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहती है तो उसे संबंधित लाइसेंस जारी करने वाले प्राधिकरण के अधिकारी को गवाह के रूप में पेश कर यह साबित करना होगा कि लाइसेंस वास्तव में उसी कार्यालय से जारी नहीं हुआ।
जस्टिस आशुतोष कुमार ने यह फैसला नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की ओर से दायर दो अपीलों को खारिज करते हुए दिया।
ये अपीलें मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, सीकर द्वारा दावेदारों के पक्ष में दिए गए मुआवजे के आदेश के खिलाफ दाखिल की गई थीं।
बीमा कंपनी का तर्क था कि दुर्घटना के समय वाहन चालक के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था, इसलिए बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन हुआ और उसे मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
अपने दावे के समर्थन में कंपनी ने एक निजी जांचकर्ता की गवाही पेश की। जांचकर्ता ने कहा कि उसकी जांच में पता चला कि चालक द्वारा प्रस्तुत ड्राइविंग लाइसेंस गुवाहाटी जिला परिवहन कार्यालय से जारी नहीं हुआ।
वहीं चालक की ओर से कहा गया कि केवल जांचकर्ता की रिपोर्ट के आधार पर लाइसेंस को फर्जी नहीं माना जा सकता।
बीमा कंपनी का दायित्व था कि वह संबंधित लाइसेंसिंग प्राधिकरण के अधिकारी को बुलाकर यह साबित करे कि उक्त लाइसेंस उसके कार्यालय से जारी नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा,
"बीमा कंपनी ने यह साबित करने के लिए संबंधित लाइसेंसिंग प्राधिकरण को तलब करने का प्रयास नहीं किया कि प्रदर्श-10 के रूप में प्रस्तुत ड्राइविंग लाइसेंस उसी प्राधिकरण द्वारा जारी नहीं किया गया। ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि चालक का लाइसेंस फर्जी था।"
कोर्ट ने अपने पूर्व फैसले यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम मोडा राम एवं अन्य का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया कि बिना पर्याप्त साक्ष्य के किसी तथ्य को सत्य मानकर नहीं चला जा सकता।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि बीमा कंपनी पॉलिसी की शर्तों के उल्लंघन को साबित करने में विफल रही है। इसलिए दोनों अपीलें खारिज करते हुए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण का मुआवजा आदेश बरकरार रखा।