POCSO और किशोर मामलों की जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों को कानूनी प्रशिक्षण दिया जाए: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO और किशोरों से जुड़े मामलों की जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों को आयु निर्धारण से संबंधित कानूनी प्रावधानों का समुचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक पॉक्सो मामले में जमानत देते हुए की, जहां जांच के दौरान पीड़िता की आयु निर्धारित करने की वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
जस्टिस अशोक कुमार जैन ने कहा कि राजस्थान के पुलिस महानिदेशक को इस बात पर विचार करना चाहिए कि ऐसे मामलों की जांच करने वाले अधिकारियों को व्यापक कानूनी प्रशिक्षण दिया जाए ताकि भविष्य में कानून के प्रावधानों का सही तरीके से पालन हो सके।
मामले में पीड़िता की उम्र को लेकर विवाद था। उसके जन आधार कार्ड में उम्र 18 वर्ष दर्ज थी जबकि शिकायतकर्ता का कहना था कि डॉक्टर ने उसकी उम्र 15 से 16 वर्ष के बीच बताई। वहीं, पीड़िता ने अपने बयान में कहा कि डॉक्टर ने उसकी उम्र 18 से 19 वर्ष के बीच बताई।
हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता की उम्र साबित करने वाला कोई दस्तावेजी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। इसके बावजूद पुलिस ने बीकानेर के खाजूवाला स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के मेडिकल ऑफिसर द्वारा किए गए अस्थि परीक्षण के आधार पर उसकी उम्र 15 से 18 वर्ष के बीच मान ली।
कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की वास्तविक उम्र का मुद्दा विचारण के दौरान तय होगा। मामले की अन्य परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आरोपी को जमानत दी।
फैसला सुनाते समय हाईकोर्ट ने किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (POCSO Act) की धारा 94 का उल्लेख करते हुए कहा कि आयु निर्धारण की एक स्पष्ट वैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है और जांच एजेंसियों के लिए उसका पालन करना अनिवार्य है। ऐसा नहीं करने से न्याय व्यवस्था प्रभावित होती है।
कोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का भी हवाला देते हुए कहा कि अस्थि परीक्षण का सहारा केवल तभी लिया जा सकता है, जब आयु साबित करने वाले आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध न हों। यदि दस्तावेज नहीं मिलते हैं, तब भी अंतिम विकल्प के रूप में cs[fkn बोर्ड की राय ली जानी चाहिए, किसी एक मेडिकल ऑफिसर की नहीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में पीड़िता की उम्र के संबंध में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के एक मेडिकल ऑफिसर की राय ली गई, जबकि कानून के अनुसार यह राय मेडिकल बोर्ड से ली जानी चाहिए थी। यह प्रक्रिया न तो किशोर न्याय अधिनियम के अनुरूप थी और न ही POCSO कानून के।
कोर्ट ने कहा,
"इससे स्पष्ट होता है कि पुलिस को कानूनी प्रावधानों की पर्याप्त जानकारी नहीं है। वास्तव में पुलिस को कानून के पालन के संबंध में व्यापक प्रशिक्षण की आवश्यकता है। ट्रायल कोर्ट का भी यह दायित्व है कि वह प्रारंभिक चरण में ही ऐसी त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाए, ताकि जांच के दौरान उन्हें सुधारा जा सके।"
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आदेश की प्रति राजस्थान के पुलिस महानिदेशक को भेजने का निर्देश दिया और उम्मीद जताई कि POCSO तथा किशोर मामलों की जांच करने वाले अधिकारियों को आयु निर्धारण संबंधी कानूनी प्रावधानों पर व्यापक प्रशिक्षण दिया जाएगा।