गैर-जमानती गंभीर धाराएं जुड़ते ही पहले मिली जमानत का लाभ समाप्त होगा: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-06-18 07:05 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी आरोपी को शुरू में केवल जमानती अपराधों में जमानत मिली हो और बाद में जांच के दौरान उससे संबंधित गंभीर गैर-जमानती धाराएं जोड़ दी जाएं, तो पहले दी गई जमानत का लाभ स्वतः जारी नहीं रह सकता। ऐसी स्थिति में जमानत निरस्त की जा सकती है।

जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति मामलों की विशेष अदालत द्वारा जमानत निरस्त किए जाने के आदेश को चुनौती दी गई थी।

मामले में आरोपी के खिलाफ FIR दर्ज हुई। प्रारंभिक जांच के बाद पुलिस ने केवल जमानती अपराध पाए। इसके आधार पर आरोपी ने जमानत बांड प्रस्तुत किए और उसे जमानत मिल गई।

हालांकि, बाद में जांच के दौरान कुछ और गंभीर तथा गैर-जमानती धाराएं भी जोड़ दी गईं। इसके बाद राज्य सरकार ने अदालत में आवेदन देकर आरोपी की जमानत निरस्त करने की मांग की। विशेष अदालत ने यह आवेदन स्वीकार कर लिया, जिसके खिलाफ आरोपी ने हाइकोर्ट में याचिका दायर की।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों, जिनमें प्रह्लाद सिंह भाटी बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और प्रदीप राम बनाम झारखंड राज्य शामिल हैं, का उल्लेख किया।

अदालत ने कहा,

“जमानती अपराधों के आधार पर आरोपी को दी गई जमानत का लाभ गंभीर गैर-जमानती अपराध जोड़े जाने के बाद जारी नहीं रखा जा सकता और ऐसी स्थिति में जमानत निरस्त की जा सकती है।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब मामले की प्रकृति बाद में अधिक गंभीर हो जाती है और ऐसे अपराध सामने आते हैं, जिनमें जमानत स्वतः अधिकार नहीं होती, तब आरोपी पहले प्राप्त जमानत के आधार पर राहत का दावा नहीं कर सकता।

इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने विशेष अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए याचिका खारिज की।

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