रेवेन्यू कोर्ट 1978 में ही सुना चुका है अंतिम फैसला: राजस्थान हाईकोर्ट ने ज़मीन विवाद की जांच के लिए पैनल बनाने पर राज्य की आलोचना की
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक सिंगल जज के उस आदेश को रद्द किया, जो राज्य सरकार द्वारा गठित फैक्ट-फाइंडिंग कमीशन (तथ्यों की जांच करने वाले आयोग) की रिपोर्ट पर आधारित था। कोर्ट ने कहा कि इस मामले पर 1978 में ही अंतिम फैसला हो चुका था, इसलिए उस रिपोर्ट पर भरोसा करना गलत था।
एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बिपिन गुप्ता की डिवीजन बेंच ने संबंधित कमीशन बनाने के लिए सरकार की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि जब बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने मामला खारिज कर दिया था, तो कमीशन के पास मामले की जांच करने का कोई अधिकार नहीं था।
बता दें, यह मामला उस ज़मीन से जुड़ा है, जो मूल रूप से अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय के सदस्यों की थी और 1961 में सामान्य श्रेणी (जनरल कैटेगरी) के एक व्यक्ति को ट्रांसफर कर दी गई।
राज्य सरकार ने इस बिक्री को राजस्थान टेनेन्सी एक्ट, 1955 (एक्ट) की धारा 42 के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी, जो इस तरह के ट्रांसफर पर रोक लगाती है। इस चुनौती को 1978 में समय-सीमा (लिमिटेशन) के आधार पर खारिज कर दिया गया और सरकार ने इस आदेश को चुनौती नहीं दी। इसलिए, यह मामला अंतिम रूप से तय हो गया।
इसके बावजूद, राज्य सरकार ने अवैध ट्रांसफर की जांच के लिए 'बेरी कमीशन' नाम का एक आयोग गठित किया। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रांसफर को अमान्य और कानूनी प्रभाव से रहित माना गया।
इसके बाद 17 साल की देरी के बाद राज्य सरकार ने 1995 में मामले को बोर्ड ऑफ रेवेन्यू को भेजने (रेफरेंस) के लिए आवेदन किया, जिसे स्वीकार कर लिया गया। बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने रेफरेंस खारिज कर दिया, जिसे राज्य सरकार ने कोर्ट में चुनौती दी। सिंगल जज ने बेरी कमीशन के निष्कर्षों पर भरोसा किया और मामले को वापस बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के पास भेज दिया।
सिंगल जज के इस आदेश के खिलाफ ज़मीन के मौजूदा मालिकों ने अपील की। उन्होंने तर्क दिया कि बहुत ज़्यादा देरी के बाद रेफरेंस/रिविजनल अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया गया।
यह तर्क दिया गया कि जब 1978 में मामले का अंतिम फैसला हो चुका था तो राज्य सरकार को कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर इसे फिर से शुरू करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसके विपरीत, राज्य ने तर्क दिया कि समय-सीमा और देरी के नियम किसी गैर-कानूनी काम को जारी रखने या शुरू से ही अमान्य (void ab initio) रहे लेन-देन को सही ठहराने के लिए यांत्रिक रूप से लागू नहीं किए जा सकते।
तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि राज्य बोर्ड ऑफ़ रेवेन्यू में नया रेफरेंस दाखिल करने के लिए बेरी कमीशन की राय को आधार नहीं बना सकता। साथ ही कोर्ट ने यह भी माना कि 34 साल बाद किसी विवाद का फैसला करने के लिए सिंगल जज कमीशन के निष्कर्ष पर भरोसा नहीं कर सकते।
बेंच ने कहा,
“हमें यह समझ नहीं आया कि किस हैसियत से बेरी कमीशन राजस्थान राज्य (ऊपर उल्लिखित) के मामले की जांच कर रहा था, जिसे बोर्ड ऑफ़ रेवेन्यू पहले ही खारिज कर चुका था। न तो बेरी कमीशन का गठन हाईकोर्ट के किसी निर्देश पर हुआ, और न ही वह बोर्ड ऑफ़ रेवेन्यू के उस फैसले की जांच कर सकता था, जिसमें राज्य की अर्ज़ी को समय-सीमा के आधार पर खारिज कर दिया गया... बेरी कमीशन ने किसी भी कोर्ट द्वारा जारी ऐसे किसी निर्देश के बिना ही निर्णायक अथॉरिटी (adjudicating authority) के तौर पर काम किया।”
कोर्ट ने कहा कि जो काम सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता, उसे अप्रत्यक्ष रूप से भी नहीं किया जा सकता और अथॉरिटी को किसी अन्य स्रोत का इस्तेमाल करके पहले से तय हो चुके मुद्दे को फिर से उठाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। यह माना गया कि अगर ऐसी इजाज़त दी जाती तो इससे पूरी न्यायिक प्रक्रिया अस्थिर हो जाती।
इसलिए आदेश रद्द कर दिया गया।
Title: M/s Sanskar Land Developers Pvt. Ltd. v State of Rajasthan & Ors.