राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर के दर्जी कन्हैया लाल की 2022 में हुई निर्मम हत्या के मामले में पांच आरोपियों को जमानत देने से इनकार किया। चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने विशेष NIA अदालत के उन आदेशों को बरकरार रखा जिनमें आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज की गईं।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में पैदा किया गया आतंक केवल किसी व्यक्ति के शरीर पर हमला नहीं था बल्कि उसने देश की मनोवैज्ञानिक संप्रभुता पर प्रहार किया। अदालत के मुताबिक, अपराध का उद्देश्य महज हत्या करना नहीं था बल्कि कानून के शासन की जगह भय का शासन स्थापित करके शांति को खत्म करना था।

अदालत ने कहा कि इस तरह की आतंकी गतिविधियां समाज पर सामान्य अपराध की तुलना में कहीं अधिक गहरा और विनाशकारी प्रभाव डालती हैं। खंडपीठ ने कहा कि कानून को उन लोगों के खिलाफ सख्ती से काम करना होगा, जो देश की सामाजिक सद्भावना और शांति को नष्ट करने का प्रयास करते हैं।

कन्हैया लाल को सोशल मीडिया पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की तत्कालीन नेता नूपुर शर्मा की पैगंबर मोहम्मद से संबंधित टिप्पणी के समर्थन में पोस्ट करने के बाद धमकियां मिलने का मामला सामने आया था। बाद में आरोपियों ने उनकी दुकान में घुसकर उनकी हत्या कर दी थी और पूरी घटना का वीडियो भी बनाया। घटना के बाद जारी किए गए एक वीडियो में आरोपियों ने हत्या को इस्लाम के कथित अपमान का बदला बताया।

राज्य की ओर से अदालत में दलील दी गई कि जांच के दौरान सामने आए साक्ष्यों से गहरी आपराधिक साजिश का संकेत मिलता है। आरोप था कि हत्या की साजिश पहले से बनाई गई और इसका उद्देश्य समाज में भय पैदा करना, लोगों की अंतरात्मा को आतंकित करना और बड़े स्तर पर दहशत फैलाना था। यह भी कहा गया कि घटना को जानबूझकर सांप्रदायिक रंग दिया गया ताकि दो समुदायों के बीच तनाव पैदा हो और राज्य में शांति भंग हो।

अदालत ने आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर विचार करते हुए गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) की धारा 43डी(5) के प्रावधानों पर गौर किया। खंडपीठ ने कहा कि इस प्रावधान के तहत जमानत पर विचार करते समय दो महत्वपूर्ण पहलुओं को ध्यान में रखना होता है आरोप प्रथम दृष्टया सही नजर आते हैं या नहीं और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की सुरक्षा।

पहले पहलू पर अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के NIA बनाम जाहूर अहमद शाह वटाली मामले का हवाला दिया। इसमें कहा गया कि जमानत से इनकार करने के लिए अदालत को इस स्तर पर यह देखना होता है कि उपलब्ध सामग्री और व्यापक परिस्थितियों के आधार पर आरोप प्रथम दृष्टया सही हैं या नहीं।

दूसरे पहलू पर अदालत ने भारत संघ बनाम के.ए. नजीब मामले का उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में कहा था कि धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर रोक संविधान के अनुच्छेद 21 की गारंटी को निष्प्रभावी नहीं बना सकती। यदि मुकदमे के उचित समय में पूरा होने की कोई संभावना नहीं हो और आरोपी लंबे समय तक जेल में रह चुका हो, तो संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए जमानत पर विचार किया जा सकता है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने गुलफिशा फातिमा बनाम दिल्ली सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का भी उल्लेख किया। इसमें कहा गया कि अनुच्छेद 21 महत्वपूर्ण संवैधानिक सुरक्षा है, लेकिन जब संसद किसी विशेष कानून के तहत जमानत देने के लिए एक निश्चित कसौटी निर्धारित करती है, तो संवैधानिक अदालत उस वैधानिक शर्त को केवल इस आधार पर निष्प्रभावी नहीं कर सकती।

इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि उसे धारा 43डी(5) के कठोर प्रावधान और अनुच्छेद 21 के तहत मिले संवैधानिक अधिकार के बीच संतुलन बनाना होगा।

खंडपीठ ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी की ओर से की गई जांच और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का अध्ययन करने के बाद कहा कि आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री मौजूद है। अदालत ने अपराध की प्रकृति को सामान्य अपराध से अलग बताते हुए इसे गहरी और संगठित आपराधिक साजिश का परिणाम माना।

आरोपी साढ़े चार साल से अधिक समय से जेल में हैं, इस दलील पर भी अदालत ने विचार किया। हालांकि, खंडपीठ ने कहा कि केवल हिरासत की अवधि को अलग से नहीं देखा जा सकता, बल्कि मुकदमे की प्रगति को भी ध्यान में रखना होगा।

अदालत ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई तेजी से और रोजाना आधार पर आगे बढ़ रही है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि मुकदमा उचित समय में पूरा होने की संभावना नहीं है। ऐसे में इस मामले में अनुच्छेद 21 के आधार पर जमानत देने का आधार नहीं बनता।

हाईकोर्ट ने कहा,

“दिनदहाड़े मृतक की दुकान में घुसकर की गई निर्मम हत्या और इस गंभीर एवं जघन्य कृत्य की रिकॉर्डिंग तथा उसे प्रसारित कर सांप्रदायिक वैमनस्य और आतंक पैदा करना राज्य की बुनियाद पर प्रहार करता है।”

खंडपीठ ने आगे कहा कि इस तरह की संगठित आतंकी गतिविधि के लिए की गई आपराधिक साजिश का समाज पर प्रभाव किसी सामान्य व्यक्तिगत अपराध की तुलना में कहीं अधिक गहरा और विनाशकारी होता है।

अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जमानत के सामान्य सिद्धांत से हटकर सख्त दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पांचों आरोपियों की अपीलें खारिज करते हुए विशेष NIA अदालत द्वारा जमानत देने से इनकार करने का आदेश बरकरार रखा।

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