जनहित के आधार पर कानूनी समय-सीमा को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट ने देरी से अवार्ड जारी होने के कारण ज़मीन अधिग्रहण कार्यवाही रद्द की

Update: 2026-08-04 05:03 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान हाउसिंग बोर्ड द्वारा 2011 में शुरू की गई ज़मीन अधिग्रहण की कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने माना कि 2017 में जारी किया गया अवार्ड, 'ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' के तहत तय अनिवार्य समय-सीमा के दायरे में नहीं था।

जस्टिस आनंद शर्मा की बेंच ने कहा कि एक बार जब 2013 के अधिनियम की धारा 24(1)(a) लागू हो गई तो कार्यवाही पर धारा 25 की समय-सीमा लागू होगी, न कि पुराने 'ज़मीन अधिग्रहण अधिनियम, 1894' की धारा 11A।

कोर्ट ने कहा,

"जनहित का मकसद चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यह कानूनी आदेश का उल्लंघन करके कार्यवाही जारी रखने की इजाज़त नहीं देता... ज़मीन अधिग्रहण कानून ज़मीन छीनने वाले (Expropriatory) होते हैं और जब कोई कानून ऐसी शक्ति देता है। साथ ही उस शक्ति के इस्तेमाल का तरीका और समय-सीमा भी तय करता है तो अथॉरिटी को कानून के दायरे में रहकर ही काम करना चाहिए।"

बता दें, अधिग्रहण की कार्यवाही 2011 में शुरू हुई, जिसमें 1 जनवरी 2014 (जब 2013 का अधिनियम लागू हुआ) तक कोई अवार्ड जारी नहीं किया गया। आखिरकार 2017 में अधिग्रहण के पक्ष में अवार्ड जारी किया गया।

याचिकाकर्ताओं ने 2013 के अधिनियम की धारा 24(1)(a) और धारा 25 के आधार पर इसे चुनौती दी थी।

धारा 24(1)(a) के अनुसार, जब 2013 के अधिनियम के लागू होने से पहले 1894 के अधिनियम के तहत कोई अवार्ड जारी नहीं किया गया तो कार्यवाही जारी रही और उस पर 2013 का अधिनियम लागू हुआ।

2013 के अधिनियम की धारा 25 के अनुसार, अधिग्रहण की घोषणा की तारीख से 12 महीने के भीतर अवार्ड जारी किया जाना ज़रूरी था। इस मामले में याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि चूंकि अवार्ड 2017 में जारी किया गया - यानी 2013 के एक्ट के लागू होने के 3 साल से ज़्यादा समय बाद और घोषणा की तारीख से 4 साल बाद - इसलिए ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया अमान्य हो गई और इसका नतीजा एक वैध अवार्ड के तौर पर नहीं निकल सकता।

इसके विपरीत, राज्य ने तर्क दिया कि चूंकि अधिग्रहण की प्रक्रिया 2013 के एक्ट से काफी पहले शुरू हो गई और उसमें ज़रूरी कदम उठाए जा चुके थे, इसलिए इसे पूरा करने में लगे समय को ही प्रक्रिया को अमान्य करने का आधार नहीं माना जा सकता।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट याचिकाकर्ताओं की दलीलों से सहमत हुआ और कहा,

“1894 के एक्ट की धारा 11A, जो एक रद्द किए गए कानून का प्रावधान है, तब तक स्वतंत्र रूप से लागू नहीं रह सकती, जब तक कि बाद के कानून में इसे स्पष्ट रूप से सुरक्षित न रखा गया हो... 2013 के एक्ट की धारा 24(1)(a) के तहत आने वाली प्रक्रियाओं के संबंध में 1894 के एक्ट की धारा 11A को लागू रखने का कोई विधायी संकेत नहीं है।”

“ऐसे मामलों में अवार्ड जारी करने की समय-सीमा 2013 के एक्ट की धारा 25 से तय होती है, जिसके तहत कलेक्टर को बारह महीने के भीतर अवार्ड जारी करना होता है... 1894 के रद्द एक्ट की धारा 11A को लागू रखने की कोई भी व्याख्या धारा 24 के पीछे के विधायी मकसद को विफल कर देगी और अजीब स्थिति पैदा करेगी, जिसमें एक रद्द कानून उन प्रक्रियाओं के मुख्य पहलुओं को नियंत्रित करता रहेगा जिन्हें नए कानून के तहत नियंत्रित किया जाना है।”

इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि 1894 के एक्ट के तहत ज़रूरी कदम उठाए गए, यह तथ्य कानून के स्पष्ट आदेश से ऊपर नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि जहां कानून में किसी काम को तय समय के भीतर करने का प्रावधान है, वहां कानूनी अधिकार रखने वाले अधिकारी ऐसी समय-सीमा का पालन करने के लिए बाध्य हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राज्य की दलीलों को मान लिया जाए तो इसका मतलब होगा कि अधिकारियों को कानून में तय समय-सीमा के बावजूद अधिग्रहण की प्रक्रिया को अनिश्चित काल तक लंबित रखने की अनुमति मिल जाएगी, जो 2013 के एक्ट के मकसद के खिलाफ होगा।

इस आधार पर अवार्ड को 2013 के एक्ट का उल्लंघन माना गया। इसलिए इसे अमान्य ठहराया गया। इसके अनुसार, याचिकाओं को मंज़ूरी दी गई और अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया रद्द की गई।

Title: Dinesh Chourasiya v State of Rajasthan & Ors, and other connected petitions

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