RPwD Act के तहत प्रोबेशनर भी 'कर्मचारी', सर्विस के दौरान विकलांगता होने पर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-08-04 04:58 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि सर्विस के दौरान विकलांग होने वाले प्रोबेशनरी सरकारी कर्मचारी को 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016' (RPwD Act) की धारा 20 के तहत सुरक्षा पाने का अधिकार है, और उसे सिर्फ़ इसलिए नौकरी से नहीं निकाला जा सकता क्योंकि वह प्रोबेशन पर था।

जस्टिस रेखा बोराना की बेंच ने एक कॉन्स्टेबल को राहत दी, जिसकी सर्विस प्रोबेशन पीरियड के दौरान एक दुर्घटना में 100% विकलांगता होने के बाद खत्म कर दी गई। कोर्ट ने कहा कि रेगुलर भर्ती प्रक्रिया से नियुक्त कर्मचारी सिर्फ़ इसलिए "कर्मचारी" नहीं रह जाता क्योंकि उसे सर्विस में कन्फर्म नहीं किया गया।

याचिकाकर्ता को 3 जून, 2013 को कॉन्स्टेबल के तौर पर नियुक्त किया गया और वह प्रोबेशन पर था जब 29 जून, 2014 को उसका एक्सीडेंट हो गया। बाद में उसे 100% विकलांग घोषित किया गया और उसकी सर्विस इस आधार पर खत्म कर दी गई कि वह कॉन्स्टेबल के कर्तव्यों को निभाने में असमर्थ हो गया।

हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 2016 एक्ट की धारा 20(4) के दूसरे प्रावधान के तहत, सर्विस के दौरान विकलांग होने वाले कर्मचारी को नौकरी से नहीं हटाया जा सकता और उसे या तो किसी दूसरे पद पर एडजस्ट किया जाना चाहिए, या रिटायरमेंट की उम्र तक सर्विस में माना जाना चाहिए।

इसके विपरीत, राज्य ने तर्क दिया कि चूंकि घटना के समय याचिकाकर्ता प्रोबेशनर-ट्रेनी था और सर्विस में कन्फर्म नहीं हुआ, इसलिए वह एक्ट की धारा 20 के अनुसार लाभ का दावा करने का हकदार नहीं है।

तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने धारा 20 को देखा और राय दी कि चूंकि याचिकाकर्ता को रेगुलर सिलेक्शन प्रोसेस के बाद नियुक्त किया गया, इसलिए वह "कर्मचारी" की श्रेणी में आता है और एक्ट की धारा 20(4) "कर्मचारी" को किसी खास वर्ग तक सीमित नहीं करती। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि प्रोबेशनर कन्फर्म होने तक कर्मचारी नहीं होता।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 'वी.पी. आहूजा बनाम पंजाब राज्य और अन्य' मामले का हवाला दिया। इसमें कहा गया कि प्रोबेशन पर काम कर रहे कर्मचारी को भी कुछ सुरक्षा पाने का अधिकार है और 'नैचुरल जस्टिस' (प्राकृतिक न्याय) के सिद्धांतों का पालन किए बिना उसकी सेवा मनमाने ढंग से खत्म नहीं की जा सकती।

आगे कहा गया,

“यह समझ से बाहर है कि जिस याचिकाकर्ता को रेगुलर भर्ती प्रक्रिया के बाद नियुक्त किया गया था, उस पर 2016 के एक्ट की धारा 20 लागू क्यों नहीं मानी जाएगी। प्रतिवादी-अधिकारियों का यह निष्कर्ष कि याचिकाकर्ता प्रोबेशन पर होने के कारण धारा 20 के तहत सुरक्षा का हकदार नहीं है, इस कोर्ट की राय में कानून का पूरी तरह से उल्लंघन है।”

इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने माना कि सेवा समाप्ति का आदेश एक्ट की धारा 20 का उल्लंघन है, इसलिए उसे रद्द कर दिया गया।

यह माना गया कि याचिकाकर्ता एक्ट की धारा 20 के तहत सभी लाभों का हकदार है। राज्य को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता को सेवा में बना हुआ माने और उसे तुरंत प्रभाव से बहाल करे।

इसके साथ ही याचिका का निपटारा कर दिया गया।

Title: Sanjay Choudhary v the State of Rajasthan & Ors.

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