राजस्थान हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के आरोपी ब्लॉक मुख्य चिकित्सा अधिकारी (BCMO) का निलंबन आदेश बहाल किया। इससे पहले ट्रिब्यूनल ने इस आधार पर निलंबन आदेश रद्द किया था कि आरोपी को निलंबित करने से पहले उसे चार्जशीट नहीं दी गई।

जस्टिस अनूप कुमार ढांड की बेंच ने कहा कि हालांकि यह नियम है कि अगर चार्जशीट नहीं दी गई तो निलंबन को 3 महीने से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता, लेकिन ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत चार्जशीट न मिलने पर निलंबन अपने आप अवैध हो जाए या रद्द हो जाए।

कोर्ट ने आगे कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों में शिकायतकर्ता के हितों की रक्षा के लिए अधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है। अगर ऐसे तकनीकी आधारों पर निलंबन आदेश रद्द कर दिया जाता है तो इससे गलत संदेश जाएगा और शिकायतकर्ता पर दबाव पड़ेगा।

मामले के संदर्भ में आरोपी अधिकारी उस समय ब्लॉक मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पद पर कार्यरत था, जब उसके खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज की गई, जिसके बाद उसे निलंबित कर दिया गया। निलंबन आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया कि अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की जाएगी और विभाग इसे आगे बढ़ाएगा।

राज्य सरकार के अनुसार, निलंबन आदेश के तुरंत बाद उन्होंने चार्जशीट तैयार करना शुरू किया। हालांकि, निलंबन आदेश की तारीख से 3 महीने पूरे होने से पहले ही, आरोपी अधिकारी ट्रिब्यूनल के पास चला गया। ट्रिब्यूनल ने केवल इस आधार पर निलंबन आदेश रद्द किया कि 3 महीने के भीतर चार्जशीट नहीं दी गई। इस आदेश को चुनौती दी गई।

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि केवल इसलिए निलंबन आदेश अपने आप खत्म नहीं हो जाता कि 3 महीने के भीतर चार्जशीट नहीं दी गई। इसके अलावा, ट्रिब्यूनल का आदेश समय से पहले (Premature) था, क्योंकि जब आरोपी अधिकारी ट्रिब्यूनल के पास गया, तब तक 3 महीने की अवधि पूरी नहीं हुई।

दोनों पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने सबसे पहले यह स्पष्ट किया कि ऐसा कोई कानून नहीं है, जो निलंबन आदेश जारी करने से पहले नोटिस देना अनिवार्य बनाता हो।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के 'अजय कुमार चौधरी बनाम भारत संघ' मामले का हवाला दिया गया, जिसमें यह कहा गया,

“…यदि चार्ज-शीट नहीं दी गई है, तो निलंबन (सस्पेंशन) को तीन महीने से अधिक नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। लेकिन, माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कभी यह नहीं कहा है कि चार्ज-शीट न मिलने पर निलंबन गैर-कानूनी हो जाता है या उसे अपने आप रद्द कर दिया जाना चाहिए। इस फैसले में केवल यह कहा गया कि निलंबन आदेश की समीक्षा की जानी चाहिए और इसे बढ़ाने के कारणों को दर्ज किया जाना चाहिए। फैसले में यह नहीं कहा गया है कि तीन महीने के भीतर चार्ज-शीट न मिलने पर निलंबन रद्द हो जाएगा।”

इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि इस मामले में, प्रतिवादी (रेस्पोंडेंट) ने 3 महीने की अवधि पूरी होने से पहले ही ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटा दिया था, जबकि उस समय विभाग चार्ज-शीट देने की प्रक्रिया में ही था। इसलिए ट्रिब्यूनल के पास यह कहने का कोई आधार नहीं था कि विभाग 3 महीने के भीतर नोटिस देने में विफल रहा है; इस तरह प्रतिवादी का यह कदम समय से पहले उठाया गया।

तदनुसार, ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया गया और प्रतिवादी के निलंबन आदेश को बहाल कर दिया गया।

Case Title : State of Rajasthan & Ors. v Dr. Rupendra Kumar Sharma

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