राजस्थान में प्रवासी अपने गृह राज्य की जाति के आधार पर SC/ST आरक्षण का लाभ नहीं ले सकते: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई उम्मीदवार, जो राजस्थान के बाहर किसी राज्य में आरक्षित श्रेणी (Reserved Category) से संबंधित है, राजस्थान आकर किसी पद के लिए आवेदन करता है, तो वह आरक्षण का लाभ पाने का हकदार नहीं होगा। ऐसे उम्मीदवार को 'सामान्य श्रेणी' (General Category) के अंतर्गत माना जाएगा।
जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा की खंडपीठ (Division Bench) एक विशेष अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील सिंगल जज के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता उम्मीदवार की याचिका खारिज की गई।
मामले के संदर्भ में, याचिकाकर्ता गुजरात की रहने वाली थीं और वहां ST श्रेणी के अंतर्गत आती थीं। उन्होंने राजस्थान के एक व्यक्ति से शादी की, जो उन्हीं की जाति का था। राजस्थान आने के बाद, उन्होंने 'नर्सिंग ऑफिसर' के पद के लिए आवेदन किया और ST श्रेणी के तहत आरक्षण का दावा किया।
उनकी उम्मीदवारी को आरक्षित श्रेणी के बजाय सामान्य श्रेणी के अंतर्गत माना गया। इसके खिलाफ एक याचिका दायर की गई, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। इसी आदेश को इस विशेष अपील में चुनौती दी गई।
राज्य के वकील ने कुछ पुराने आदेशों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि यदि कोई व्यक्ति, जो किसी राज्य में आरक्षित श्रेणी से संबंधित है, दूसरे राज्य में चला जाता है, तो उसकी उम्मीदवारी को सामान्य श्रेणी के अंतर्गत माना जाएगा।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने 'मरी चंद्र शेखर राव बनाम डीन, सेठ जी.एस. मेडिकल कॉलेज और अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र किया।
इसमें कहा गया था:
"...एक जगह से दूसरी जगह जाने (Migration) का अधिकार सभी को प्राप्त है - चाहे वे अनुसूचित जाति/जनजाति के हों या न हों। लेकिन जब कोई अनुसूचित जाति या जनजाति का व्यक्ति दूसरे राज्य में जाता है तो उसे जाने से रोका नहीं जा सकता। हालांकि दूसरे राज्य में जाने पर, वह अपने मूल राज्य में मिलने वाले विशेष अधिकारों या सुविधाओं को अपने साथ नहीं ले जा सकता और न ही उनका दावा कर सकता है।"
इसके अलावा, 'महाराष्ट्र राज्य में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को जाति प्रमाण पत्र जारी करने के मुद्दे पर एक्शन कमेटी' (Action Committee on the issue of Caste Certificate to Scheduled Castes and Scheduled Tribes in the State of Maharashtra and Anr. V/s UOI और अन्य (V/s UOI & Anr.) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य फैसले का भी हवाला दिया गया।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह राय दी:
“सिर्फ इसलिए कि किसी राज्य (राज्य A) में कोई विशेष जाति 'अनुसूचित जाति' (Scheduled Caste) के रूप में अधिसूचित है तो इसका मतलब यह नहीं है कि किसी दूसरे राज्य में उसी नाम की कोई अन्य जाति होने पर पहले राज्य की उस जाति का व्यक्ति, दूसरे राज्य की अनुसूचित जाति के सदस्य को मिलने वाले अधिकारों, विशेषाधिकारों और लाभों का हकदार होगा — 'इस संविधान के उद्देश्यों के लिए'।”
इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने सिंगल जज के फैसले से सहमति जताई और तदनुसार, अपील खारिज कर दी गई।
Case Title : Baria Sharmishtha Ben v State of Rajasthan & Ors