केवल प्रशासनिक असुविधा बताकर डॉक्टर को उच्च अध्ययन से नहीं रोका जा सकता: राजस्थान हाइकोर्ट

Update: 2026-03-12 07:56 GMT

राजस्थान हाइकोर्ट ने एक मेडिकल अधिकारी को बड़ी राहत देते हुए कहा कि केवल प्रशासनिक असुविधा का हवाला देकर किसी डॉक्टर को उच्च अध्ययन करने से रोका नहीं जा सकता। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि चयनित डॉक्टर को तुरंत सेवा से मुक्त किया जाए ताकि वह सीनियर रेजिडेंसी कोर्स में समय पर शामिल हो सके।

जस्टिस नुपुर भाटी की पीठ ने यह अंतरिम आदेश उस याचिका पर दिया, जिसमें राज्य सेवा में कार्यरत एक महिला मेडिकल अधिकारी ने शिकायत की थी कि सीनियर रेजिडेंसी कोर्स में चयनित होने के बावजूद सरकार ने उन्हें पद से मुक्त नहीं किया।

याचिकाकर्ता ने बताया कि उन्होंने पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल डिग्री पूरी करने के बाद सीनियर रेजिडेंसी कोर्स के लिए आवेदन किया। यह कोर्स मेडिकल कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के लिए आवश्यक माना जाता है। चयन होने के बावजूद विभाग ने उन्हें औपचारिक रूप से कार्यमुक्त नहीं किया, जिससे उनके करियर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था।

राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि डॉक्टर की नियुक्ति जनहित में की गई और प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण उन्हें तत्काल कार्यमुक्त करना संभव नहीं है। सरकार ने यह भी बताया कि राज्य में लगभग 450 डॉक्टर सीनियर रेजिडेंसी के लिए और करीब 800 डॉक्टर पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स के लिए चयनित हुए। यदि सभी को एक साथ कार्यमुक्त कर दिया गया तो स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ सकता है।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाइकोर्ट ने डॉ. रोहित कुमार बनाम उपराज्यपाल कार्यालय के सचिव मामला में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय का उल्लेख किया। उस फैसले में कहा गया कि उच्च योग्यता प्राप्त डॉक्टर न केवल मेडिकल क्षेत्र बल्कि पूरे समाज के लिए महत्वपूर्ण संपत्ति होते हैं और उच्च अध्ययन के बाद वे बेहतर कौशल के साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में योगदान देते हैं।

हाइकोर्ट ने कहा कि केवल अस्थायी प्रशासनिक कठिनाइयों या डॉक्टरों की कमी के आधार पर किसी को उच्च शिक्षा या करियर उन्नति से वंचित करना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि मेडिकल शिक्षा में प्रगति अंततः सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को ही मजबूत बनाती है।

इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया और सीनियर रेजिडेंसी कोर्स में एडमिशन की अंतिम तिथि देखते हुए याचिकाकर्ता को तुरंत कार्यमुक्त करने का निर्देश दिया।

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