मामूली विरोधाभास और शत्रुतापूर्ण गवाह दोषसिद्धि को प्रभावित नहीं करते: 33 साल पुराने मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने धारा 324 IPC की सज़ा बरकरार रखी
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गवाहों के बयान में मामूली विरोधाभास या कुछ अभियोजन गवाहों के शत्रुतापूर्ण हो जाने मात्र से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता, यदि संपूर्ण साक्ष्य विश्वसनीय और संगत हो।
जस्टिस अरुण मोंगा की पीठ ने यह टिप्पणी धारा 324 भारतीय दंड संहिता (स्वेच्छा से चोट पहुँचाना) के तहत दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली अपीलों पर सुनवाई करते हुए की।
अपीलकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि अभियोजन के कुछ गवाह शत्रुतापूर्ण हो गए पीड़ित पक्ष के पारिवारिक गवाहों के बयानों में विरोधाभास है तथा घटना के पीछे कोई ठोस उद्देश्य (मोटिव) सिद्ध नहीं किया गया।
इन दलीलों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि घटना वर्ष 1982 की है और गवाहों का परीक्षण कई वर्षों बाद हुआ। समय के अंतराल के कारण स्मृति में कमी आना स्वाभाविक है। ऐसे में मामूली विरोधाभास अभियोजन की कहानी को असत्य नहीं ठहराते।
गवाहों के शत्रुतापूर्ण होने के प्रश्न पर कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमों में ऐसा होना असामान्य नहीं है और यह प्रायः बाहरी प्रभाव का संकेत होता है। यदि अन्य साक्ष्य भरोसेमंद और पुष्ट हों तो शत्रुतापूर्ण गवाही का लाभ अभियुक्त को नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायालय का दायित्व है कि वह संपूर्ण साक्ष्य का समग्र मूल्यांकन करे और सार को अलग करे। केवल इस आधार पर अभियोजन को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि कुछ गवाह अपने पूर्व बयान से पलट गए।
मोटिव के अभाव के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि उद्देश्य महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन यदि प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य स्पष्ट रूप से अपराध सिद्ध करते हों तो मोटिव का न होना दोषसिद्धि में बाधक नहीं है।
हालाँकि दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सज़ा के प्रश्न पर कोर्ट ने नरमी बरती। अदालत ने 33 वर्षों से लंबित मुकदमे, घटना के समय अभियुक्तों की कम उम्र, प्रथम अपराधी होने और अपराध की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए दंड को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया।
इसके साथ ही अपीलों का निस्तारण कर दिया गया।