चेक मामले में आरोपी को मजबूत बचाव का अधिकार, हस्ताक्षर जांच के लिए FSL भेजने का आदेश: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) की धारा 139 के तहत चेक धारक के पक्ष में जो कानूनी अनुमान बनाया गया, उससे आरोपी पर अपने बचाव का बोझ बढ़ जाता है। ऐसे में निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार और अधिक मजबूत हो जाता है और उसे पूरा अवसर दिया जाना आवश्यक है।
जस्टिस अनूप कुमार ढांढ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें आरोपी के चेक पर हस्ताक्षर की FSL जांच कराने के आवेदन को खारिज कर दिया गया।
मामले में आरोपी का शुरू से ही यह कहना था कि विवादित चेक पर उसके हस्ताक्षर नहीं हैं और उसने कभी भी शिकायतकर्ता को चेक जारी नहीं किया। इसी आधार पर उसने साक्ष्य के चरण में हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच की मांग की थी।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए आवेदन खारिज किया कि आरोपी बैंक अधिकारी को बुलाकर अपना पक्ष साबित कर सकता है और आवेदन देर से दायर किया गया।
हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को गलत ठहराते हुए कहा कि आरोपी का बचाव का अधिकार एक मानवीय और मौलिक अधिकार है जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है।
कोर्ट ने कहा,
“जब कानून आरोपी पर ही यह बोझ डालता है कि वह खुद को निर्दोष साबित करे तब निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 139 के तहत बना अनुमान पूर्ण नहीं है बल्कि खंडनीय है यानी आरोपी को इसे चुनौती देने का पूरा अधिकार है।
हाईकोर्ट ने कहा कि हस्ताक्षर असली हैं या नहीं, यह केवल वैज्ञानिक जांच से ही स्पष्ट हो सकता है। इसलिए विवादित चेक को FSL (फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला) भेजना आवश्यक है।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार की और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि चेक को FSL जांच के लिए भेजा जाए।
इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि चेक बाउंस मामलों में भी आरोपी को निष्पक्ष और प्रभावी बचाव का पूरा अवसर मिलना चाहिए।