फाइनल रिपोर्ट पर फैसला देने के बाद मजिस्ट्रेट दोबारा आदेश नहीं दे सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-05-19 10:07 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जब किसी मामले में पुलिस की नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट पर मजिस्ट्रेट आदेश पारित कर देता है तो वह फंक्टस ऑफिशियो हो जाता है। उसके बाद विरोध याचिका पर अलग से दूसरा आदेश पारित नहीं कर सकता।

जस्टिस अनूप कुमार ढांढ की पीठ ने स्पष्ट किया कि फाइनल रिपोर्ट और विरोध याचिका पर एक साथ विचार करते हुए मजिस्ट्रेट को एक ही साझा आदेश पारित करना चाहिए।

अदालत ने कहा,

“यदि शिकायतकर्ता विरोध याचिका दाखिल करता है और उसके समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करता है तो मजिस्ट्रेट के पास तीन विकल्प होते हैं। फाइनल रिपोर्ट स्वीकार करना, फाइनल रिपोर्ट खारिज कर आरोपियों के खिलाफ संज्ञान लेना या आगे जांच का आदेश देना। इस चरण पर दो अलग-अलग आदेश पारित नहीं किए जा सकते।”

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि मजिस्ट्रेट पहले अंतिम रिपोर्ट पर आदेश पारित कर देता है तो वह उस विषय में अपना अधिकार समाप्त कर देता है। बाद में विरोध याचिका पर अलग से आदेश देने का अधिकार नहीं रखता।

मामला एक दुष्कर्म FIR से जुड़ा था, जिसमें आरोपी पर शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया गया।

पुलिस जांच के बाद आरोपी के पक्ष में निगेटिव फाइनल रिपोर्ट दाखिल की गई। इसके खिलाफ शिकायतकर्ता ने विरोध याचिका दायर की।

मजिस्ट्रेट ने पुलिस की फाइनल रिपोर्ट स्वीकार करते हुए विरोध याचिका खारिज की।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने आपराधिक पुनर्विचार याचिका दाखिल की, जिसे पुनर्विचार अदालत ने स्वीकार की। पुनर्विचार अदालत का मानना था कि मजिस्ट्रेट को पहले फाइनल रिपोर्ट पर अलग आदेश पारित करना चाहिए था और उसके बाद दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 200 और 202 के तहत जांच कर विरोध याचिका पर अलग आदेश देना चाहिए था।

इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

आरोपी की ओर से अदालत में कहा गया कि शिकायतकर्ता देशभर में इसी प्रकार के कई मामले दर्ज कराने की आदी है और उसके खिलाफ पहले भी 16 ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। यह भी कहा गया कि अधिकांश मामलों में या तो कार्यवाही रद्द हुई या आरोपी बरी हुए।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण अदालत की राय को गलत ठहराया।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पुनरीक्षण अदालत द्वारा सुझाई गई प्रक्रिया दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के ढांचे के विपरीत है।

हाईकोर्ट ने कहा कि कानून यह नहीं कहता कि फाइनल रिपोर्ट और विरोध याचिका पर दो अलग-अलग आदेश पारित किए जाएं। मजिस्ट्रेट को दोनों पहलुओं पर एक साथ विचार कर एक ही समेकित आदेश देना होता है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पुनर्विचारण अदालत का आदेश रद्द किया और मामले को नए सिरे से आदेश पारित करने के लिए वापस भेज दिया।

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