राजस्थान हाइकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि कोई भी आरोपी नार्को विश्लेषण (नार्को टेस्ट) के लिए दी गई अपनी सहमति को परीक्षण से पहले या उसके दौरान भी वापस ले सकता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार दी गई सहमति अंतिम (अपरिवर्तनीय) नहीं मानी जा सकती।

जस्टिस अनूप कुमार धांध की पीठ ने कहा कि यदि आरोपी की इच्छा के विरुद्ध नार्को टेस्ट किया जाता है, तो यह उसके मौलिक अधिकारों जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) तथा आत्मदोषारोपण के खिलाफ अधिकार (अनुच्छेद 20(3)) का उल्लंघन होगा।

अदालत ने कहा,

“नार्को टेस्ट किसी भी संदिग्ध व्यक्ति पर उसकी इच्छा के खिलाफ नहीं किया जा सकता। उसे यह पूरा अधिकार है कि वह अपनी सहमति कभी भी वापस ले सके।”

यह मामला उस आरोपी से जुड़ा था जिस पर एक महिला के अपहरण और जबरन विवाह का आरोप था। आरोपी ने पहले नार्को टेस्ट के लिए सहमति दी, जिसके आधार पर मजिस्ट्रेट ने जांच अधिकारी को परीक्षण की अनुमति दी थी और तारीख भी तय कर दी गई थी।

हालांकि बाद में आरोपी ने अपनी सहमति वापस लेने के लिए आवेदन दिया यह कहते हुए कि उसे स्वयं के खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने यह आवेदन यह कहकर खारिज किया कि आरोपी पहले ही सहमति दे चुका है।

हाइकोर्ट ने इस फैसले को गलत ठहराते हुए कहा कि सहमति को स्थायी नहीं माना जा सकता। यदि आरोपी अपनी सहमति वापस लेता है और इसके बावजूद टेस्ट कराया जाता है तो यह जबरन कार्रवाई मानी जाएगी।

अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे जबरन कराए गए नार्को टेस्ट के परिणाम साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं होंगे।

साथ ही हाइकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि नार्को टेस्ट केवल स्वेच्छा से और उचित सुरक्षा उपायों के साथ ही किया जा सकता है। अदालत को हर मामले में परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना चाहिए।

अंततः हाइकोर्ट ने आरोपी की याचिका स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध नार्को टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

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