30 साल फरार रहने के बाद गिरफ्तार हत्या आरोपी को राहत: राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा- मानसिक रूप से अक्षम व्यक्ति पर निष्पक्ष सुनवाई संभव

Update: 2026-05-27 06:37 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या के एक आरोपी को राहत देते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा है, जिसमें 30 साल तक फरार रहने के बाद गिरफ्तार किए गए आरोपी को रिहा करने का निर्देश दिया गया। अदालत ने माना कि आरोपी डिमेंशिया जैसी गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित है और वह अदालत की कार्यवाही को समझने या उसमें भाग लेने की स्थिति में नहीं है।

जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। यदि आरोपी मानसिक रूप से सक्षम नहीं है तो उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा।

अदालत ने कहा,

किसी भी आरोपी पर तब तक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जब तक यह प्रमाणित न हो जाए कि वह स्वस्थ मानसिक स्थिति में है। किसी व्यक्ति को बिना सुने दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”

मामला वर्ष 1994 में दर्ज हत्या के एक मुकदमे से जुड़ा था। आरोपी घटना के बाद करीब 30 वर्षों तक फरार रहा और वर्ष 2024 में उसे गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के समय उसकी मानसिक स्थिति सामान्य बताई गई, लेकिन बाद में आरोपी के बेटे ने अदालत में आवेदन देकर कहा कि उसका पिता डिमेंशिया से पीड़ित है और अदालत की कार्यवाही समझने में सक्षम नहीं है।

ट्रायल कोर्ट ने इस आवेदन को स्वीकार करते हुए आरोपी को रिहा करने का आदेश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि आवेदन समय से पहले दायर किया गया, क्योंकि उस समय तक आरोप तय नहीं हुए और न ही मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई।

सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट ने मेडिकल बोर्ड गठित करने के निर्देश दिए। मेडिकल रिपोर्ट में बताया गया कि आरोपी डिमेंशिया से पीड़ित है, अदालत की कार्यवाही समझने में असमर्थ है और भविष्य में उसके ठीक होने की संभावना भी नहीं है।

इस रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने कहा,

एक आपराधिक मुकदमा ऐसे व्यक्ति के खिलाफ नहीं चल सकता, जो मानसिक रूप से मुकदमे का सामना करने के योग्य न हो। आरोपी में आरोपों को समझने, कार्यवाही का पालन करने और अपना बचाव प्रस्तुत करने की मानसिक क्षमता होना आवश्यक है।”

हाइकोर्ट ने यह तर्क भी खारिज किया कि आवेदन समय से पहले दायर किया गया। अदालत ने कहा कि जब आरोपी की मानसिक अक्षमता स्थापित हो चुकी है तब आरोप तय होने का इंतजार करना केवल औपचारिकता भर होगा।

अदालत ने आरोपी की रिहाई बरकरार रखते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि आरोपी की हर वर्ष मेडिकल जांच कराई जाए। यदि भविष्य में आरोपी मुकदमे की कार्यवाही समझने की स्थिति में पाया जाता है तो इसकी रिपोर्ट ट्रायल कोर्ट को सौंपी जाए।

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