POCSO Act में 'किशोर स्वायत्तता' की अनदेखी: राजस्थान हाइकोर्ट ने सहमति वाले युवा संबंधों को छूट देने पर सरकार से विचार करने को कहा
राजस्थान हाइकोर्ट ने यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण से जुड़े POCSO कानून के मौजूदा प्रावधानों पर गंभीर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार से इस कानून की व्यापक समीक्षा करने को कहा।
हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह कानून बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया था लेकिन सहमति से बने किशोर और युवा संबंधों में इसका कठोर और यांत्रिक प्रयोग कानून को संरक्षण के बजाय दंड का माध्यम बना रहा है।
जस्टिस अनिल कुमार उपमन की पीठ ने सुझाव दिया कि POCSO Act में ऐसा प्रावधान जोड़ा जाना चाहिए, जिसके अंतर्गत लगभग समान आयु के युवक-युवती यदि सहमति वाले संबंध में हों तो उन्हें आपराधिक दायरे से बाहर रखा जा सके।
हाइकोर्ट ने कहा कि POCSO का उद्देश्य यौन अपराधियों से बच्चों की रक्षा करना है न कि सामाजिक रूप से अस्वीकार्य माने जाने वाले सहमति संबंधों में शामिल युवाओं को अपराधी ठहराना।
अदालत ने 17 वर्षीय लड़की और 19 वर्षीय युवक के मामले में कानून के कठोर प्रयोग को किशोर स्वायत्तता की वास्तविकता की अनदेखी बताया और कहा कि इससे संरक्षण का उद्देश्य दंडात्मक सामाजिक नियंत्रण में बदल जाता है।
अदालत ने कहा कि हाल के वर्षों में सहमति से बने किशोर संबंधों से जुड़े मामलों की संख्या में वृद्धि हुई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मौजूदा कानूनी ढांचा यौन शोषण और सहमति वाले किशोर संबंधों के बीच अंतर करने में असफल है। ऐसे मामलों में न्यायपालिका को युवाओं को अपराधी मानने के लिए विवश होना पड़ता है, जबकि वयस्कता के करीब पहुंचे किशोरों में भावनात्मक और व्यक्तिगत निर्णय लेने की क्षमता होती है।
हाइकोर्ट एक युवक द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उसके खिलाफ अपहरण और POCSO के तहत गंभीर आरोप लगाए गए। रिकॉर्ड के अवलोकन में अदालत ने पाया कि न तो पीड़िता न उसके भाई के बयानों में और न ही चिकित्सकीय साक्ष्यों में किसी प्रकार के यौन शोषण का आरोप सामने आया। इसके विपरीत, यह स्पष्ट था कि लड़की स्वयं अपनी इच्छा से घर से निकली थी और आरोपी के साथ स्वेच्छा से विभिन्न स्थानों पर गई।
अदालत ने इस तथ्य पर भी जोर दिया कि पीड़िता घटना के समय 17 वर्ष की थी और इतनी कम उम्र की नहीं थी कि उसे आसानी से बहला-फुसलाकर ले जाया जा सके।
हाइकोर्ट ने कहा कि 18 वर्ष की कठोर आयु-सीमा और आयु-समीपता के किसी अपवाद के अभाव में ऐसे वैधानिक पीड़ित बनाए जा रहे हैं, जो स्वयं को पीड़ित मानते ही नहीं। सहमति से घर छोड़ने के मामलों में अक्सर यह कानून माता-पिता द्वारा असहमति के कारण इस्तेमाल किया जाता है न कि वास्तविक बाल संरक्षण की आवश्यकता के चलते।
अदालत ने कहा कि जब 17 वर्ष की लड़की को पूरी तरह निर्णय लेने में अक्षम मान लिया जाता है तो कानून उसकी अपनी आवाज और अनुभव को नकार देता है। इससे कानूनी व्यवस्था परिवारिक दबाव और राज्य प्रायोजित उत्पीड़न का साधन बन जाती है।
हाइकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय का भी उल्लेख किया जिसमें शोषण और सहमति से बने आयु-समीप संबंधों के बीच स्पष्ट अंतर करने की आवश्यकता पर बल दिया गया था। साथ ही विधि आयोग की रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा गया कि POCSO के अनेक मामले वास्तविक शोषण के नहीं बल्कि विवाह की मंशा रखने वाले युवा जोड़ों से जुड़े होते हैं।
अदालत ने जांच एजेंसी की भूमिका पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि बिना किसी ठोस साक्ष्य के गंभीर धाराएं जोड़ना अत्यंत चिंताजनक है।
हाइकोर्ट ने कहा कि कठोर दंड और सख्त जमानत प्रावधानों वाले कानून का इस प्रकार का प्रयोग उसे संरक्षण के बजाय उत्पीड़न का साधन बना देता है। एक 19 वर्षीय युवक को पीड़िता द्वारा आरोपों से इनकार के बावजूद गंभीर अपराधी के रूप में प्रस्तुत करना उसके जीवन पर गहरा मानसिक और सामाजिक प्रभाव डालता है।
हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि आरोप तय करते समय अदालत को केवल औपचारिक प्रक्रिया का पालन नहीं करना चाहिए बल्कि विवेकपूर्ण ढंग से साक्ष्यों का मूल्यांकन करना चाहिए।
इन सभी तथ्यों के मद्देनजर हाइकोर्ट ने केंद्र सरकार से POCSO Act में आयु-समीप सहमति वाले किशोर संबंधों को छूट देने का प्रावधान जोड़ने का सुझाव दिया।
अदालत ने कहा कि ऐसा प्रावधान न्यायपालिका को शोषण और सहमति के मामलों में अंतर करने की स्वतंत्रता देगा और युवाओं के अनावश्यक अपराधीकरण को रोकेगा।
अंततः हाइकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए आरोपी युवक के खिलाफ दर्ज FIR रद्द की।