पिता के साथ कारोबार करने से बेटे की स्वतंत्र दुकान की वास्तविक जरूरत खत्म नहीं होती: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने किरायेदारी और दुकान खाली कराने से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया कि यदि मकान मालिक का बेटा अपने पिता और भाई के साथ पारिवारिक कारोबार में काम कर रहा है, तो केवल इस आधार पर उसकी स्वतंत्र व्यवसाय स्थापित करने की वास्तविक आवश्यकता को खारिज नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने कहा कि पारिवारिक कारोबार में काम करना और स्वयं के स्वतंत्र व्यवसाय के लिए उपयुक्त दुकान उपलब्ध होना दो अलग-अलग परिस्थितियां हैं। किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपनी आजीविका छोड़कर केवल इसलिए बेरोजगार बैठा रहे कि उसकी दुकान खाली कराने का मुकदमा न्यायालय में लंबित है।
जस्टिस फरजंद अली ने भारत कुमार एवं चंद्रा की ओर से दायर रिट याचिका स्वीकार करते हुए किराया अधिकरण, जोधपुर महानगर के 27 मई 2011 तथा अपीलीय किराया अधिकरण के 22 मई 2015 के आदेश निरस्त कर दिए। दोनों अधीनस्थ अधिकरणों ने मकान मालिकों की दुकान खाली कराने की याचिका और उसके विरुद्ध दायर अपील खारिज कर दी थी।
यह निर्णय 9 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया। न्यायालय ने अपने निर्णय में मकान मालिक की वास्तविक आवश्यकता, पारिवारिक कारोबार में संलग्नता, लंबे समय तक चलने वाली न्यायिक कार्यवाही और किरायेदार के वैधानिक संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से विचार किया।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता भारत कुमार और उनकी पत्नी चंद्रा जोधपुर के सरदारपुरा क्षेत्र के निवासी हैं। वे रेलवे स्टेशन रोड स्थित अपनी किराए की दुकान का कब्जा प्राप्त करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने वर्ष 2005 में राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 की धारा 9 के अंतर्गत किराया अधिकरण के समक्ष याचिका दायर की थी।
मकान मालिकों का कहना था कि उन्हें सिलाई मशीनों, इलेक्ट्रॉनिक सामान, उपहार सामग्री और इससे संबंधित वस्तुओं का अपना कारोबार शुरू करने के लिए दुकान की आवश्यकता है। उनका यह भी तर्क था कि किरायेदार अन्य स्थानों पर भी कारोबार कर रहे हैं और उनके पास वैकल्पिक व्यावसायिक परिसर उपलब्ध हैं।
किराया अधिकरण ने साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद 27 मई 2011 को याचिका खारिज कर दी। इसके बाद मकान मालिकों ने अपीलीय किराया अधिकरण में अपील दायर की, जिसे 22 मई 2015 को खारिज कर दिया गया। दोनों आदेशों से असंतुष्ट होकर उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 227 के अंतर्गत राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पिता के साथ काम करना स्वतंत्र कारोबार की जरूरत के विरुद्ध निर्णायक साक्ष्य नहीं
जस्टिस फरजंद अली ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि अधीनस्थ अधिकरण ने इस तथ्य को अत्यधिक महत्व दिया कि भारत कुमार दुकान संख्या-2 में अपने पिता के साथ कारोबार कर रहे थे। अधिकरण ने इसी परिस्थिति के आधार पर उनकी स्वतंत्र दुकान की आवश्यकता को वास्तविक और सद्भावपूर्ण मानने से इनकार किया था।
हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण से असहमति जताते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का अपने पिता के साथ कारोबार करना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसके पास अपना स्वतंत्र और उपयुक्त व्यावसायिक प्रतिष्ठान उपलब्ध है।
न्यायालय ने कहा कि परिवार में पिता अपने अनुभव, संसाधनों और स्नेह के कारण बेटे को कारोबार सीखने और आजीविका कमाने का अवसर दे सकता है। लेकिन ऐसी व्यवस्था को जीवनभर जारी रहने वाली अनिवार्य व्यवस्था नहीं माना जा सकता। समय के साथ व्यक्ति स्वतंत्र व्यवसाय स्थापित करने और अपनी अलग व्यावसायिक पहचान बनाने की इच्छा रख सकता है।
न्यायालय के अनुसार, यदि बेटा अपने पिता या भाई के कारोबार में काम कर रहा है, तो इससे उसकी स्वतंत्र व्यवसाय स्थापित करने की आकांक्षा समाप्त नहीं हो जाती। पारिवारिक कारोबार में काम करने और स्वयं की दुकान होने के बीच स्पष्ट अंतर है।
मुकदमा लंबित रहने के दौरान बेरोजगार बैठना जरूरी नहीं
न्यायालय ने इस मामले के एक महत्वपूर्ण पहलू पर विशेष जोर दिया। दुकान खाली कराने की कार्यवाही वर्ष 2005 में शुरू हुई थी और मामला लगभग दो दशक तक न्यायिक प्रक्रिया में लंबित रहा।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह इतने लंबे समय तक बेरोजगार बैठा रहे और अपनी आजीविका चलाने के लिए कोई काम न करे, केवल इसलिए कि जिस दुकान में वह स्वतंत्र कारोबार शुरू करना चाहता है, वह अभी किरायेदार के कब्जे में है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लंबित मुकदमे के दौरान पिता और भाई के साथ काम करना, कारोबार सीखना और अपनी आजीविका अर्जित करना इस बात का प्रमाण नहीं है कि मकान मालिक ने अपनी स्वतंत्र दुकान की आवश्यकता छोड़ दी है।
न्यायालय के अनुसार, कानून किसी व्यक्ति को अपनी वास्तविक आवश्यकता सिद्ध करने के लिए बेरोजगारी या आर्थिक कठिनाई में रहने के लिए बाध्य नहीं करता। न्यायिक कार्यवाही के दौरान जीवन और आजीविका की आवश्यकताएं रुक नहीं जातीं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया।
अनिल बजाज बनाम विनोद आहूजा, (2014) 15 एससीसी 610 के निर्णय का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि मकान मालिक अपने व्यवसाय के लिए किस परिसर का उपयोग करना चाहता है, यह तय करने का अधिकार सामान्यतः उसी का है। किरायेदार मकान मालिक को यह निर्देश नहीं दे सकता कि वह अपना कारोबार किस प्रकार या किस स्थान पर संचालित करे।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मकान मालिक अन्य दुकानों से कारोबार कर रहा है, केवल इस आधार पर उसे विवादित दुकान का कब्जा प्राप्त करने से वंचित नहीं किया जा सकता, बशर्ते वह उस दुकान का उपयोग अपने व्यवसाय के लिए करना चाहता हो।
इसी प्रकार, रामकुबाई बनाम हजारीमल धोकलचंद चांडक, दीवानी अपील संख्या 329/1998, निर्णय दिनांक 13 अगस्त 1999 का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि परिवार के अन्य सदस्य पहले से कारोबार कर रहे हों, तब भी किसी बेटे की स्वतंत्र व्यवसाय स्थापित करने की वास्तविक आवश्यकता समाप्त नहीं हो जाती।
इसके अतिरिक्त, हुकुम चंद्र बनाम नेमी चंद जैन, (2019) 13 एससीसी 363 के निर्णय का हवाला देते हुए न्यायालय ने दोहराया कि मकान मालिक के बेटे से यह अपेक्षा करना अनुचित है कि वह दुकान खाली कराने की याचिका का अंतिम निर्णय होने तक कोई काम न करे। कार्यवाही लंबित रहने के दौरान किसी अन्य व्यवसाय में संलग्न हो जाना अपने आप में वास्तविक आवश्यकता को नकारने का आधार नहीं है।
मौजूदा कारोबार का विस्तार करना भी वैध व्यावसायिक उद्देश्य
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि मकान मालिक का बेटा अपने पिता के कारोबार को आगे बढ़ाना चाहता है, तो भी विवादित दुकान का उपयोग करना एक वैध व्यावसायिक उद्देश्य हो सकता है। इसी प्रकार, वह उसी स्थान पर अपना स्वतंत्र कारोबार भी स्थापित कर सकता है।
न्यायालय ने उल्लेख किया कि विवादित दुकान पिता की दुकान के पास स्थित है। ऐसी स्थिति में दुकान का उपयोग मौजूदा कारोबार के विस्तार या स्वतंत्र व्यावसायिक प्रतिष्ठान के रूप में करने की संभावना को केवल पारिवारिक कारोबार में पहले से संलग्न होने के कारण खारिज नहीं किया जा सकता।
न्यायालय के अनुसार, किसी व्यावसायिक संपत्ति का स्वामी यह अपेक्षा रख सकता है कि आवश्यकता पड़ने पर वह अपनी संपत्ति का उपयोग अपने कारोबार के लिए कर सके। यह मान लेना उचित नहीं है कि संपत्ति केवल किसी अन्य व्यक्ति को किराए पर देने के लिए ही खरीदी गई थी।
वास्तविक आवश्यकता का आकलन केवल वर्तमान स्थिति से नहीं होगा
जस्टिस फरजंद अली ने स्पष्ट किया कि वास्तविक और सद्भावपूर्ण आवश्यकता का अर्थ ऐसी ईमानदार, वास्तविक और गंभीर आवश्यकता है, जो केवल किरायेदार को बेदखल कराने के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया दिखावटी दावा न हो।
न्यायालय के अनुसार, यह जांचना आवश्यक है कि मकान मालिक वास्तव में उस परिसर का उपयोग उस उद्देश्य के लिए करना चाहता है, जिसका उसने उल्लेख किया है। केवल इस आधार पर कि वह वर्तमान में किसी दूसरे स्थान पर काम कर रहा है या उसने अपनी आजीविका के लिए अस्थायी व्यवस्था कर रखी है, उसकी आवश्यकता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
इसी तरह, बिना किसी ठोस साक्ष्य के यह अनुमान लगाना भी उचित नहीं है कि दुकान का कब्जा मिलने के बाद मकान मालिक उसे किसी तीसरे व्यक्ति को किराए पर दे देगा। यदि आवश्यकता वास्तविक है, तो उसे केवल भविष्य में संभावित दुरुपयोग की आशंका के आधार पर नकारा नहीं जा सकता।
किरायेदार को भी कानून ने दिया है संरक्षण
न्यायालय ने राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 की धारा 9(i) में उपलब्ध वैधानिक संरक्षण का भी उल्लेख किया।
इस प्रावधान के अनुसार, वास्तविक आवश्यकता के आधार पर दुकान खाली कराने का आदेश प्राप्त करने वाले मकान मालिक पर तीन वर्ष की अवधि तक उस परिसर को किसी अन्य व्यक्ति को किराए पर देने की रोक लागू होती है। यदि मकान मालिक इस प्रावधान का उल्लंघन करते हुए परिसर किसी अन्य व्यक्ति को किराए पर देता है, तो निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार पूर्व किरायेदार कब्जा वापस प्राप्त करने के लिए किराया अधिकरण के समक्ष याचिका दायर कर सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि कानून में इस प्रकार का संरक्षण उपलब्ध होने के कारण केवल इस आशंका से वास्तविक आवश्यकता के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता कि भविष्य में मकान मालिक परिसर का उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए कर सकता है।
अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप क्यों किया?
किरायेदारों की ओर से यह तर्क दिया गया कि दोनों अधीनस्थ अधिकरणों ने साक्ष्यों का मूल्यांकन करके निष्कर्ष निकाले थे और संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट को ऐसे समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने माना कि अनुच्छेद 227 के अंतर्गत अधिकारिता पर्यवेक्षी है और इसका उद्देश्य प्रत्येक मामले में अपीलीय न्यायालय की तरह साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन करना नहीं है। हालांकि, जब अधीनस्थ अधिकरण किसी गलत कानूनी धारणा पर आगे बढ़ता है, महत्वपूर्ण साक्ष्य को उचित परिप्रेक्ष्य में नहीं देखता या ऐसा निष्कर्ष निकालता है जो स्पष्ट रूप से अनुचित हो, तब हाईकोर्ट अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग कर सकता है।
वर्तमान मामले में न्यायालय ने पाया कि बेटे का अपने पिता के साथ कारोबार करना और उसके पास स्वतंत्र व्यावसायिक प्रतिष्ठान उपलब्ध होना—इन दोनों अलग-अलग परिस्थितियों को एक मान लिया गया था। इसी त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण के कारण वास्तविक आवश्यकता के संबंध में महत्वपूर्ण साक्ष्य का उचित मूल्यांकन प्रभावित हुआ।
जस्टिस फरजंद अली ने निष्कर्ष निकाला कि केवल पिता के साथ कारोबार करने के आधार पर भारत कुमार की स्वतंत्र दुकान की वास्तविक आवश्यकता को अस्वीकार करना उचित नहीं था। लंबे समय तक चली न्यायिक कार्यवाही के दौरान परिवार के कारोबार में काम करते रहने से उनकी स्वतंत्र व्यवसाय स्थापित करने की इच्छा समाप्त नहीं मानी जा सकती।
इन्हीं कारणों से राजस्थान हाईकोर्ट ने भारत कुमार एवं चंद्रा की रिट याचिका स्वीकार कर ली तथा किराया अधिकरण, जोधपुर महानगर का 27 मई 2011 और अपीलीय किराया अधिकरण का 22 मई 2015 का आदेश निरस्त कर दिया। न्यायालय ने लंबित आवेदन भी निस्तारित कर अभिलेख वापस भेजने के निर्देश दिए।
रजाक खान हैदर @ लाइव लॉ नेटवर्क