PC Act के तहत कार्रवाई के लिए रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार करना ही काफी: राजस्थान हाईकोर्ट
भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 (PC Act) के तहत दर्ज FIR रद्द करने की याचिका खारिज करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि इस प्रावधान के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि संबंधित सरकारी कर्मचारी वास्तव में वह सरकारी काम करने की स्थिति में हो।
जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की बेंच ने टिप्पणी की कि इस अपराध के मामले में यह काफी है कि सरकारी कर्मचारी ने यह विश्वास दिलाकर रिश्वत स्वीकार की हो कि वह रिश्वत देने वाले की मदद किसी अन्य सरकारी कर्मचारी के माध्यम से करवा देगा, और रिश्वत देने वाले ने वास्तव में उसी विश्वास के आधार पर रिश्वत दी हो।
यह याचिका सरकारी कर्मचारी द्वारा दायर की गई, जिसने यह तर्क दिया था कि उसके पास कोई काम लंबित नहीं था। यह भी कि टेलीफोन पर हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग के लिए पुख्ता सबूत की आवश्यकता होती है और उस पर पूरी तरह से भरोसा नहीं किया जा सकता।
इसके विपरीत, राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि शिकायतकर्ता, याचिकाकर्ता और बिचौलिए के बीच हुई टेलीफोन पर बातचीत से प्रथम दृष्टया (पहली नज़र में) रिश्वत की मांग साबित होती है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता और बिचौलिए दोनों का 'फिनोलफथेलिन टेस्ट' भी पॉजिटिव पाया गया।
दोनों पक्षकारों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने टेलीफोन पर हुई बातचीत, याचिकाकर्ता और बिचौलिए से बरामद हुई नकदी, और साथ ही पॉजिटिव फिनोलफथेलिन टेस्ट को ध्यान में रखते हुए यह कहा कि इन सभी तथ्यों से स्पष्ट रूप से यह साबित होता है कि 2018 अधिनियम के तहत अपराध बनता है।
याचिकाकर्ता के पास कोई काम लंबित न होने के तर्क के संबंध में कोर्ट ने फैसला सुनाया कि FIR रद्द करने के लिए यह कोई वैध आधार नहीं है। कोर्ट ने यह राय व्यक्त की कि भले ही वह काम किसी अन्य अधिकारी द्वारा किया जाना हो, फिर भी रिश्वत की मांग करना अपने आप में 2018 अधिनियम के तहत एक अपराध माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के मामले 'चतुरदास भगवानदास पटेल बनाम गुजरात राज्य' का हवाला देते हुए यह कहा गया:
“इस धारा के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि रिश्वत की मांग या उसे लेते समय सरकारी कर्मचारी उस सरकारी काम, एहसान या सेवा को करने की स्थिति में हो। इस धारा के तहत अपराध साबित करने के लिए यह काफी है कि रिश्वत लेने वाला सरकारी कर्मचारी, रिश्वत देने वाले को यह विश्वास दिलाकर या यह जताकर रिश्वत लेता है कि वह "किसी अन्य सरकारी कर्मचारी के साथ मिलकर" उसकी मदद करेगा, और रिश्वत देने वाला उसी विश्वास के आधार पर रिश्वत देता है।”
इस पृष्ठभूमि में यह माना गया कि इस चरण पर कोर्ट को केवल अपराध के प्रथम दृष्टया (Prima Facie) अस्तित्व को देखना था, जो कि साबित हो गया।
Title: Jagdish Singh v State of Rajasthan & Anr.