राजस्थान हाईकोर्ट ने आपराधिक मामले में आरोपी दंपती को अपने बेटे की सर्जरी के लिए चार महीने के लिए अमेरिका जाने की अनुमति दी। बेटे की सर्जरी अमेरिका में होनी है। हाईकोर्ट ने कहा कि बीमार बच्चे के साथ रहने और उसकी देखभाल करने के लिए उसका अस्पताल में भर्ती होना जरूरी शर्त नहीं हो सकती।

जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि माता-पिता की अपने बच्चे के स्वास्थ्य को लेकर चिंता और भावनात्मक जुड़ाव को केवल इस आधार पर नहीं आंका जा सकता कि डॉक्टर की सलाह अस्पताल में भर्ती कराने की है या नहीं। अदालत ने कहा कि बच्चे की सर्जरी तय होने की स्थिति में माता-पिता का उसके साथ रहना स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है।

मामले में याचिकाकर्ता दंपती एक आपराधिक मामले में आरोपी हैं और उन्हें पहले ही गिरफ्तारी से संरक्षण मिला हुआ। उन्होंने अपने बेटे की प्रस्तावित सर्जरी के दौरान उसके साथ रहने के लिए अमेरिका जाने की अनुमति मांगी थी। निचली अदालत ने लंबित जांच और आरोपियों के भारत से फरार होने की आशंका का हवाला देते हुए उनकी अर्जी खारिज की।

मामले की सुनवाई के दौरान प्रतिवादी की ओर से दलील दी गई कि बेटे की सर्जरी के संबंध में डॉक्टर की सलाह केवल बाह्य रोगी विभाग के आधार पर थी और उसमें अस्पताल में भर्ती होने की बात नहीं कही गई।

हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

जस्टिस फरजंद अली ने कहा,

“भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में माता-पिता और बच्चे के बीच प्रेम और स्नेह का अपना विशेष महत्व है। यदि बेटा बीमार है तो माता-पिता का स्वाभाविक रूप से उसके पास पहुंचना सामान्य मानवीय प्रतिक्रिया है। जब बच्चा किसी बीमारी से पीड़ित हो और उसकी सर्जरी होने वाली हो तो माता-पिता की उसके साथ रहने की इच्छा स्वाभाविक और समझने योग्य है। केवल इस आधार पर ऐसी पारिवारिक परिस्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि डॉक्टर की सलाह बाह्य रोगी विभाग के आधार पर दी गई।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी से संरक्षण मिलने का अर्थ जांच से छूट मिलना नहीं है। जांच अपनी प्रक्रिया के अनुसार जारी रह सकती है। हालांकि, अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य मौजूद नहीं है जिससे यह पता चले कि जांच के दौरान आरोपियों की व्यक्तिगत मौजूदगी तत्काल जरूरी है।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई ठोस आधार भी सामने नहीं रखा गया जिससे यह साबित हो कि आरोपियों की अस्थायी विदेश यात्रा से जांच में बाधा आएगी या जांच प्रभावित होगी। ऐसे में केवल जांच लंबित होने को विदेश यात्रा पर रोक लगाने का आधार नहीं बनाया जा सकता, खासकर तब जब आरोपियों को पहले ही गिरफ्तारी से संरक्षण प्राप्त है।

अदालत ने आरोपियों को चार महीने के लिए विदेश जाने की अनुमति देते हुए याचिका स्वीकार की। हाईकोर्ट ने विदेश मंत्रालय, आव्रजन अधिकारियों और पुलिस को निर्देश दिया कि वे आरोपियों की विदेश यात्रा में किसी तरह की बाधा न डालें।

इस तरह हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी के खिलाफ जांच लंबित होना अपने आप में उसकी अस्थायी विदेश यात्रा पर पूर्ण रोक लगाने का आधार नहीं है, यदि उसकी यात्रा से जांच प्रभावित होने की कोई ठोस आशंका रिकॉर्ड पर मौजूद न हो।

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