हस्ताक्षर दिखाकर दस्तावेज़ छिपाकर क्रॉस-एग्जामिनेशन करना अस्वीकार्य, राजस्थान हाईकोर्ट ने 'पिजन होल थ्योरी' पर लगाई समय-सीमा

Update: 2026-02-01 15:29 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट जज जस्टिस संजीत पुरोहित की एकल पीठ ने संपत्ति विवाद से जुड़े एक पुराने सिविल मुकदमे में साक्ष्य कानून की महत्वपूर्ण व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया कि किसी गवाह से जिरह के दौरान दस्तावेज़ का केवल हस्ताक्षर वाला भाग दिखाकर शेष सामग्री छिपाना सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है। न्यायालय ने कहा कि ऐसी पद्धति भ्रामक हो सकती है और निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों के विपरीत है।

याचिकाकर्ता राजेश कुमार ने पाली स्थित मरुधर होटल से संबंधित संपत्ति को संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति बताते हुए घोषणा, बंटवारा एवं निषेधाज्ञा की मांग में वाद दायर किया था। वाद के दौरान प्रतिवादी पक्ष ने 23 जून 1988 की कथित पारिवारिक सुलह को जाली बताते हुए संपत्ति को संयुक्त पारिवारिक संपत्ति मानने से इनकार किया।

मुकदमे के दौरान जब प्रतिवादी के गवाह की जिरह चल रही थी, तब वादी ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 138 एवं 145 के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर यह अनुमति मांगी कि गवाह को केवल हस्ताक्षर दिखाकर, दस्तावेज़ की पूरी सामग्री छिपाकर, उसके हस्ताक्षरों की पहचान कराई जाए। इस पद्धति को वादी ने “पिजन होल थ्योरी” अथवा “विंडो मेथड” बताया।

अपर जिला जज, पाली ने 17 सितम्बर 2025 को उक्त आवेदन खारिज करते हुए कहा कि किसी गवाह को क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान दस्तावेज़ दिखाया जाए तो पूरा दस्तावेज़ दिखाया जाना चाहिए। केवल हस्ताक्षर वाला भाग दिखाकर शेष सामग्री छिपाना विधिसम्मत नहीं है। बाद में समान प्रकृति का एक और आवेदन दायर किया गया, जिसे 14 नवम्बर 2025 को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि यह पूर्व आदेश की पुनरावृत्ति (रिव्यू) है और स्वीकार्य नहीं है। साथ ही, लगातार विलंब को देखते हुए गवाह की जिरह का अधिकार भी बंद कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने विस्तार से साक्ष्य अधिनियम की धाराओं 138, 145, 45, 47, 67 और 73 का परीक्षण किया और कहा कि कानून में कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि गवाह को केवल हस्ताक्षर दिखाकर शेष दस्तावेज़ छिपाया जाए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि “पिजन होल थ्योरी” का सीमित उपयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जा सकता है, जहां गवाह वस्तुतः हस्तलेखन या हस्ताक्षर का विशेषज्ञ हो। वर्तमान मामले में प्रतिवादी का गवाह विशेषज्ञ नहीं था और स्वयं उसने कहा था कि पूरा दस्तावेज़ देखे बिना वह अपने ही हस्ताक्षर पहचानने में असमर्थ है।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अयाची की ओर से अधिवक्ता राजेश परिहार ने मद्रास हाईकोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि इस प्रकार की जिरह भ्रामक हो सकती है और इससे एक सच्चा गवाह भी भ्रमित हो सकता है। अदालतों को ऐसी “चालाक” या “छलपूर्ण” जिरह को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए।

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि मूल वाद पिछले 20 वर्षों से लंबित है, मुद्दे वर्ष 2006 में तय हो चुके थे और एक ही गवाह की जिरह 11 तिथियों में 62 पृष्ठों तक चली। ऐसे में बार-बार समान आवेदन देकर कार्यवाही में देरी करना प्रक्रिया का दुरुपयोग है। हाईकोर्ट ने माना कि दूसरे आवेदन पर रेस जुडीकाटा का सिद्धांत लागू होता है और अधीनस्थ अदालत द्वारा जिरह का अधिकार बंद करना परिस्थितियों में उचित था।

इन सभी कारणों से हाईकोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के दोनों आदेशों को सही ठहराते हुए रिट याचिका खारिज कर दी। साथ ही स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत पर्यवेक्षणीय अधिकार का प्रयोग तभी किया जा सकता है, जब निचली अदालत के आदेश में स्पष्ट अवैधता या गंभीर त्रुटि हो, जो इस मामले में नहीं पाई गई।

केस टाइटल: राजेश कुमार बनाम आनंद कुमार व अन्य एस.बी. सिविल रिट याचिका नम्बर 24708/2025

लेखक- रज़ाक़ खान हैदर @ लाइव लॉ नेटवर्क

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