वर्षों तक चुप रहने वाले दावेदार को नहीं मिलेगा पुरानी अवधि का ब्याज: राजस्थान हाईकोर्ट ने बरकरार रखा कॉमर्शियल कोर्ट का फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई दावेदार लंबे समय तक अपने कथित अधिकार को लेकर निष्क्रिय बना रहता है और उचित समय के भीतर भुगतान की मांग तक नहीं करता तो वह बाद में उस अवधि के लिए ब्याज की मांग नहीं कर सकता, जब वह स्वयं बिना किसी उचित कारण के चुप बैठा रहा हो।
एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश मिश्रा और जस्टिस बिपिन गुप्ता की खंडपीठ ने कहा कि कानून उन लोगों की सहायता करता है, जो अपने अधिकारों के प्रति सजग रहते हैं न कि उन लोगों की जो वर्षों तक अपने अधिकारों पर सोए रहते हैं।
अदालत ने कहा,
“जब वादी स्वयं लंबे समय तक निष्क्रिय रहा और उसने उचित समय के भीतर अपने कथित अधिकार का दावा नहीं किया तो वह बाद में उस अवधि के लिए ब्याज नहीं मांग सकता, जिसके दौरान वह स्वेच्छा से मौन रहा। कोई भी पक्ष अपनी ही निष्क्रियता का लाभ उठाकर पूरे अंतराल की अवधि का ब्याज नहीं मांग सकता।”
मामला एक वाणिज्यिक विवाद से जुड़ा था। वर्ष 2008 में अपीलकर्ता और प्रतिवादी के बीच माल की खरीद-बिक्री के कुछ लेनदेन हुए। अपीलकर्ता का आरोप था कि प्रतिवादी ने माल का पूरा भुगतान नहीं किया। हालांकि, बकाया राशि की मांग को लेकर अपीलकर्ता ने दिसंबर 2011 तक कोई कानूनी नोटिस जारी नहीं किया।
बाद में अपीलकर्ता ने वसूली का मुकदमा दायर किया। कॉमर्शियल कोर्ट ने उसके पक्ष में आंशिक राहत देते हुए बकाया राशि के भुगतान का आदेश दिया, लेकिन ब्याज की गणना वर्ष 2008 से करने के बजाय नोटिस जारी होने की तारीख 1 दिसंबर 2011 से करने का निर्देश दिया।
इस आदेश को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कहा कि ब्याज की गणना उस समय से होनी चाहिए, जब भुगतान देय हुआ था, अर्थात वर्ष 2008 से।
मामले की सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट ने पाया कि कथित देनदारी वर्ष 2008 में उत्पन्न हुई लेकिन अपीलकर्ता ने लगभग तीन वर्षों तक कोई कदम नहीं उठाया। अदालत ने यह भी नोट किया कि इस लंबे विलंब के लिए कोई संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया गया।
खंडपीठ ने कहा कि मुकदमा दायर होने से पहले की अवधि के लिए ब्याज देना मूल रूप से न्यायसंगत और विवेकाधीन राहत का विषय है, जब तक कि किसी अनुबंध या कानून में इसके लिए विशेष प्रावधान न हो। ऐसे मामलों में राहत मांगने वाले पक्ष को स्वयं भी पूरी तत्परता और सावधानी दिखानी होती है।
अदालत ने स्पष्ट किया,
“जब कोई दावेदार वर्षों तक निष्क्रिय बना रहता है और उचित समय के भीतर मांग नोटिस तक जारी नहीं करता, तब अदालत भुगतान की औपचारिक मांग पहली बार किए जाने की तारीख से ही ब्याज देने तक सीमित रह सकती है।”
हाईकोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता की निष्क्रियता के कारण प्रतिवादी पर उस अवधि का ब्याज थोपना उचित नहीं होगा, जब स्वयं अपीलकर्ता ने अपने दावे की वसूली के लिए कोई त्वरित कदम नहीं उठाया था।
इसी आधार पर अदालत ने कॉमर्शियल कोर्ट का आदेश सही ठहराते हुए अपील खारिज की और नोटिस जारी होने की तारीख से ब्याज देने का फैसला बरकरार रखा।