'अलग रहने की मांग पर पति द्वारा पत्नी को जलाना अविश्वसनीय': 22 साल बाद पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हत्या मामले में व्यक्ति को किया बरी
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति को 22 वर्ष बाद बरी कर दिया, जिसे अपनी गर्भवती पत्नी को आग लगाने के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने कहा कि अलग रहने जैसे तुच्छ विवाद को हत्या का विश्वसनीय उद्देश्य (motive) नहीं माना जा सकता और अभियोजन द्वारा बताया गया उद्देश्य अत्यंत कमजोर है।
हाईकोर्ट ने वर्ष 2004 में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें तेजा सिंह को धारा 302 IPC के तहत दोषी ठहराया गया था। उनके भाई बलजीत सिंह @ गोगा को भी समान मंशा के साथ हत्या का दोषी माना गया था, हालांकि उनकी अपील 2015 में निधन के कारण समाप्त हो चुकी थी।
जस्टिस एन.एस. शेखावत और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने कहा:
“अभियोजन द्वारा बताया गया उद्देश्य अत्यंत कमजोर है। यह कहना कि अलग रहने के मामूली विवाद के कारण कोई व्यक्ति अपनी ही पत्नी को—वह भी गर्भवती अवस्था में—आग लगा दे, अत्यंत अविश्वसनीय है, विशेषकर तब जब पति-पत्नी के बीच कोई वास्तविक विवाद सिद्ध नहीं हुआ।”
उद्देश्य (Motive) को अदालत ने अविश्वसनीय माना
अभियोजन का दावा था कि मृतका वीरपाल कौर अलग निवास चाहती थीं, जिससे पति तेजा सिंह और देवर बलजीत सिंह के साथ तनाव पैदा हुआ और इसी कारण उन्हें जला दिया गया।
अदालत ने इसे खारिज करते हुए कहा कि:
अभियोजन साक्ष्यों से यह भी सामने आया कि मृतका का विवाद मुख्यतः बलजीत सिंह और उसकी पत्नी से था, न कि पति तेजा सिंह से।
विवाह के मध्यस्थ करतार सिंह (मृतका के नाना) ने स्वीकार किया कि दोनों भाइयों की जमीन व संपत्ति पहले ही बंट चुकी थी और वे अलग-अलग थे; विवाद केवल अलग निवास को लेकर था।
ऐसे तुच्छ विवाद पर हत्या का निष्कर्ष निकालना तर्कसंगत नहीं है।
मामला मुख्यतः मृत्यु पूर्व कथन (Dying Declaration) पर आधारित
अभियोजन का पूरा मामला 11 जुलाई 2002 को दर्ज कथित मृत्यु पूर्व कथन पर टिका था, जिसमें कहा गया था कि पति ने केरोसिन डाला और देवर ने आग लगाई।
हाईकोर्ट ने इस मृत्यु पूर्व कथन को अविश्वसनीय और असुरक्षित मानते हुए दोषसिद्धि के लिए अपर्याप्त कहा।
मृत्यु पूर्व कथन में गंभीर खामियाँ
अदालत ने कई गंभीर कमियाँ रेखांकित कीं:
कथन मजिस्ट्रेट के बजाय पुलिस अधिकारी ने दर्ज किया; यह नहीं बताया गया कि मजिस्ट्रेट क्यों नहीं बुलाया गया।
चिकित्सकीय फिटनेस प्रमाण डॉक्टर ने नहीं, बल्कि जांच अधिकारी ने लिखा।
99% जलने और गंभीर श्वसन समस्या की स्थिति में मृतका के विस्तृत बयान देने की क्षमता संदिग्ध थी।
डॉक्टर द्वारा प्रमाणन में लापरवाही और यांत्रिक रवैया अपनाया गया, जो स्थापित कानूनी मानकों के विपरीत है।
मृत्यु पूर्व कथन में आग लगाने के बाद मारपीट का आरोप था, लेकिन किसी डॉक्टर ने मारपीट के निशान नहीं पाए। न तो एमएलआर और न ही पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने इस आरोप का समर्थन किया।
आत्महत्या की संभावना अधिक प्रतीत हुई
प्रत्यक्षदर्शी अरदास सिंह और बचाव पक्ष के गवाह राजिंदर सिंह ने बताया कि कमरा अंदर से बंद था और दरवाज़ा तोड़कर खोला गया।
फोटो साक्ष्यों में भी मुड़ा हुआ दरवाज़े का कुंडा दिखा, जिससे बचाव पक्ष की कहानी—कि दरवाज़ा बाहर से तोड़ा गया—को बल मिला।
अदालत ने माना कि आत्महत्या की संभावना अधिक प्रतीत होती है, खासकर जब गवाहों ने कहा कि बचाव के समय मृतका बेहोश थी और बोलने की स्थिति में नहीं थी।
अभियुक्तों का आचरण दोषसिद्धि के विपरीत
अदालत ने यह भी नोट किया कि अभियुक्तों ने ही मृतका को कई अस्पतालों में भर्ती कराया, CMC लुधियाना में भर्ती किया, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए और इलाज का खर्च स्वयं उठाया।
ऐसा आचरण हत्या के प्रयास से मेल नहीं खाता।
निष्कर्ष
अदालत ने कहा कि अभियोजन संदेह से परे अपराध सिद्ध करने में विफल रहा और ट्रायल कोर्ट ने अविश्वसनीय मृत्यु पूर्व कथन पर भरोसा कर गलती की।
परिणामस्वरूप, तेजा सिंह की दोषसिद्धि और सजा रद्द की गई और उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।