पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के लिए समझौते के आधार पर FIR रद्द करने की अनुमति देना कानून के नियम के विरुद्ध है, क्योंकि पीड़ित की मृत्यु हो चुकी है और वह सहमति नहीं दे सकता तथा अपराध का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।

जस्टिस सुमीत गोयल ने कहा,

"आरोपी और शिकायतकर्ता जिन्होंने केवल आपराधिक प्रक्रिया शुरू की थी, के बीच समझौता इस तरह के रद्द करने के अंतर्निहित तर्क को संतुष्ट करने में विफल रहता है। यह मृतक को पहुंचाई गई अपूरणीय क्षति तथा इस तरह के गंभीर अपराधों में शामिल व्यापक सामाजिक हित की उपेक्षा करता है। इस प्रकार, ऐसे मामलों में रद्द करने की अनुमति देना कानून के नियम को कमजोर करता है। अपराध की गंभीर प्रकृति को महत्वहीन बनाता है जिसके लिए न्यायिक सावधानी और संयम की आवश्यकता होती है।"

न्यायालय ने चेतावनी देते हुए कहा कि IPC की धारा 306/BNS की धारा 108 के तहत दर्ज FIR को केवल उसके गुण-दोष के आधार पर रद्द करने की याचिका पूरी तरह से स्वीकार्य है। इस पर विचार किया जाना चाहिए तथा उसके गुण-दोष के आधार पर तर्क-वितर्क किया जाना चाहिए।

न्यायालय ने आगे कहा,

"जब समाज के सामूहिक मानस पर गहरा और प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले गंभीर और जघन्य प्रकृति के अपराधों को समझौते के बहाने रद्द कर दिया जाता है- जिसमें अक्सर आर्थिक विचार शामिल होते हैं - तो यह हानिकारक मिसाल कायम करता है। इस तरह के परिणाम यह धारणा बनाते हैं कि न्याय का वस्तुकरण किया जा सकता है, जिससे वित्तीय लाभ उठाने वालों को लाभ होता है।”

ये टिप्पणियां समझौता विलेख के आधार पर आईपीसी की धारा 306/34 के तहत दर्ज FIR रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए की गईं। प्रस्तुतियों को सुनने के बाद एक बार आपराधिक कानून की मशीनरी चालू हो जाने के बाद पीड़ित को हाशिए पर नहीं रखा जा सकता या उसे भुलाया नहीं जा सकता।

न्यायिक प्रक्रिया में अभियुक्त और पीड़ित के प्रतिस्पर्धी हितों के बीच न्यायसंगत संतुलन अनिवार्य है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि किसी भी पक्ष के अधिकारों को अन्यायपूर्ण तरीके से कमतर नहीं आंका जा सकता। न्यायालय न्याय के संरक्षक हैं और उनके निर्णय में निष्पक्षता, समानता और कानून के शासन को बनाए रखने में व्यापक सामाजिक हित के सामंजस्यपूर्ण अंतर्संबंध को प्रतिबिंबित करना चाहिए।

न्यायालय ने कहा,

"यह सुनिश्चित करना कानून की अदालतों का अनिवार्य कर्तव्य है कि न्याय घायल और पीड़ित को गले लगाए।"

जस्टिस गोयल ने पुरानी कहावत का जिक्र करते हुए कहा,

"कानून को उन लोगों की ओर से बोलना चाहिए, जो ऐसा नहीं कर सकते।"

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि FIR-शिकायतकर्ता पीड़ित से अलग है। हालांकि किसी विशेष मामले में वे एक ही व्यक्ति हो सकते हैं।

जस्टिस गोयल ने इस बात पर प्रकाश डाला कि किसी अपराध से संबंधित मामले में जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु हुई।

"मृतक ही पीड़ित है। ऐसे मामले में पीड़ित का जीवित परिवार जिसमें पति/पत्नी/माता-पिता/बच्चे/अभिभावक/देखभाल करने वाला आदि शामिल हैं बल्कि FIR/शिकायतकर्ता/सूचनाकर्ता पीड़ित की भूमिका नहीं निभा सकते।"

इसके अलावा न्यायालय ने कहा कि कानून, समानता और निष्पक्षता का गारंटर होने के नाते, धन के प्रभाव के अधीन नहीं हो सकता, अन्यथा यह इसके पवित्र सार और संस्थागत अखंडता से समझौता करेगा।

उपर्युक्त के आलोक में न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी।

केस टाइटल: अर्नदीप कौर @ इरनदीप कौर और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य

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