महत्वपूर्ण DNA साक्ष्य आरोपी के सामने न रखने से ट्रायल हुआ दूषित: पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट ने मौत की सजा रद्द की, नए सिरे से सुनवाई के आदेश
पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने एक पांच वर्षीय बच्ची के अपहरण, दुष्कर्म और हत्या से जुड़े मामले में दोषी ठहराए गए विनोद उर्फ मुन्ना को दी गई मौत की सजा रद्द की। हाइकोर्ट ने कहा कि आरोपी का बयान दर्ज करते समय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 के तहत गंभीर प्रक्रियात्मक चूक हुई, जिससे पूरे ट्रायल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
हाइकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि DNA रिपोर्ट और अन्य अहम फोरेंसिक साक्ष्य आरोपी के समक्ष नहीं रखे गए, जिससे उसे अपना पक्ष स्पष्ट करने का अवसर नहीं मिला। यह आरोपी के साथ अन्याय है और इससे ट्रायल दूषित हो गया। इसी आधार पर कोर्ट ने मामले को CrPC की धारा 313 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 351) के चरण से दोबारा शुरू करने के आदेश दिए।
जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने कहा,
“यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने आरोपी के समक्ष सभी आपराधिक परिस्थितियां रखी हों।”
खंडपीठ ने माना कि अपीलीय अदालत के पास यह अधिकार होता है कि वह छूट गए आपराधिक साक्ष्य आरोपी के सामने रखे या ट्रायल कोर्ट को ऐसा करने का निर्देश दे, लेकिन यह निर्णय यांत्रिक ढंग से नहीं लिया जा सकता। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि आरोपी को कितना पूर्वाग्रह हुआ, उसका बचाव क्या था और सुनवाई के दौरान क्या आपत्तियां उठाई गईं।
हाइकोर्ट ने कहा कि आरोपी को बचाव पक्ष का साक्ष्य पेश करने का अधिकार है। ऐसे साक्ष्यों का मूल्यांकन भी आवश्यक होता है। इसलिए न्याय के हित में, पीड़िता और उसके परिवार के साथ-साथ आरोपी के अधिकारों का संतुलन बनाए रखने के लिए एकमात्र विकल्प यही है कि मामले को वापस ट्रायल कोर्ट भेजा जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह घटना दिसंबर 2020 की रात की है, जो पीड़िता के पांचवें जन्मदिन की रात थी। अभियोजन के अनुसार, 27 वर्षीय विनोद, जो पेशे से प्लंबर था और आपराधिक पृष्ठभूमि रखता था, ने झज्जर (हरियाणा) में बच्ची को उसके माता-पिता के किराए के मकान से अगवा किया। इसके बाद वह बच्ची को अपने पास के घर ले गया, उसके साथ दुष्कर्म किया और दम घोंटकर हत्या कर दी।
ट्रायल पूरा होने के बाद सत्र न्यायालय ने विनोद को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी और सजा की पुष्टि के लिए मामला CrPC की धारा 366 के तहत हाइकोर्ट को भेजा गया था। वहीं, आरोपी ने भी अपनी सजा और दोषसिद्धि के खिलाफ अपील दायर की थी।
अभियोजन पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य, चिकित्सीय और फोरेंसिक रिपोर्ट, आपत्तिजनक वस्तुओं की बरामदगी और DNA रिपोर्ट पर भरोसा किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बच्ची की मौत का कारण दम घुटना बताया गया और जबरन यौन शोषण के स्पष्ट संकेत दर्ज थे। पीड़िता के माता-पिता के बयान भी CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज किए गए।
हाइकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
हालांकि, बचाव पक्ष ने CrPC की धारा 313 के बयान में खामियों को लेकर कोई विशेष तर्क नहीं रखा था, लेकिन फैसला लिखते समय हाइकोर्ट ने गंभीर अनियमितताओं पर स्वतः ध्यान दिया।
कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के माता-पिता के धारा 164 के बयान आरोपी के सामने नहीं रखे गए। डीएनए रिपोर्ट, जो आरोपी को अपराध से जोड़ती बताई गई, और टॉक्सिकोलॉजी रिपोर्ट, जिसमें आरोपी के शराब सेवन की बात थी, वह भी आरोपी से नहीं पूछी गई।
इसके अलावा, आरोपी के सामने पूरे-पूरे गवाहों के बयान एक साथ पढ़कर रख दिए गए, जो समझ से परे थे। कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 313 का उद्देश्य आरोपी के सामने विशिष्ट और स्पष्ट परिस्थितियां रखना है, न कि लंबी और जटिल गवाही दोहरा देना।
हाइकोर्ट ने कहा कि आरोपी को उसके खिलाफ मौजूद महत्वपूर्ण साक्ष्यों की व्याख्या का अवसर न देना निष्पक्ष सुनवाई की जड़ पर चोट करता है।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि आपराधिक न्याय प्रणाली में हर प्रक्रिया का सावधानीपूर्वक पालन अनिवार्य है। गंभीर मामलों, विशेषकर जहां मृत्युदंड का प्रश्न हो, वहां CrPC की धारा 313 का अनुपालन केवल औपचारिकता नहीं बल्कि अनिवार्य शर्त है।
नए सिरे से सुनवाई के निर्देश
इन कारणों से हाइकोर्ट ने दोषसिद्धि और मौत की सजा का आदेश रद्द कर दिया। मामले को सेशन कोर्ट को यह निर्देश देते हुए वापस भेजा गया कि आरोपी का बयान BNSS की धारा 351 के तहत नए सिरे से दर्ज किया जाए, सभी आपराधिक साक्ष्य स्पष्ट और संक्षिप्त रूप में उसके सामने रखे जाएं और उसे बचाव पक्ष का साक्ष्य पेश करने का पूरा अवसर दिया जाए।
हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है। साथ ही, हत्या संदर्भ को निरर्थक मानते हुए समाप्त कर दिया गया।
यह देखते हुए कि मामला वर्ष 2021 से लंबित है और FIR 2020 की है, हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से सुनवाई में तेजी लाने का अनुरोध किया, ताकि “त्वरित न्याय और दबे हुए न्याय” के बीच संतुलन बना रहे।