सरकार नागरिकों की जमीन पर अवैध कब्जा कर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकती: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट, मुआवजा देने का आदेश

Update: 2026-06-26 12:20 GMT

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि कल्याणकारी राज्य होने के नाते सरकार नागरिकों की निजी जमीन पर प्रतिकूल कब्जे का सिद्धांत लागू कर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकती। अदालत ने हरियाणा सरकार को बिना भूमि अधिग्रहण के सिंचाई नहर के लिए इस्तेमाल की गई निजी जमीन का उचित मुआवजा तीन महीने के भीतर देने का निर्देश दिया।

जस्टिस रमेश कुमारी ने कहा कि राज्य का दायित्व अपने नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा करना है। सरकार को नागरिकों की जमीन पर अवैध कब्जा कर उसे अपनी संपत्ति में बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

अदालत ने कहा,

“राज्य एक कल्याणकारी राज्य है। वह अपने ही नागरिकों की संपत्ति पर कब्जा करने वाला अतिक्रमणकारी नहीं बन सकता। प्रतिकूल कब्जे के आधार पर राज्य नागरिकों की भूमि पर मालिकाना हक हासिल नहीं कर सकता।”

मामला फतेहाबाद जिले के बनमंदोरी गांव की 119 कनाल भूमि से जुड़ा था। भूमि मालिकों का कहना था कि उनकी सात कनाल जमीन पर सरकार ने सिंचाई के लिए बनाई गई नहर को पक्का किया, जबकि न तो जमीन का विधिवत अधिग्रहण किया गया और न ही कोई मुआवजा दिया गया।

वहीं, राज्य सरकार ने दलील दी कि यह नहर वर्ष 1960 से मौजूद है और भूमि मालिकों ने कभी इसका विरोध नहीं किया। सरकार ने यह भी दावा किया कि लंबे समय से खुले और निरंतर कब्जे के कारण उसे प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक प्राप्त हो गया।

ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने सरकार की इस दलील को स्वीकार करते हुए भूमि मालिकों का दावा खारिज किया था। दोनों अदालतों ने माना कि सरकार प्रतिकूल कब्जे के आधार पर जमीन की मालिक बन चुकी है और 12 वर्ष की समयसीमा बीत जाने के कारण मुकदमा भी सुनवाई योग्य नहीं है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इन निष्कर्षों को गलत ठहराया।

अदालत ने कहा कि संपत्ति का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत संरक्षित संवैधानिक और मानव अधिकार है। किसी व्यक्ति की भूमि कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया अपनाए बिना नहीं ली जा सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही नहर सार्वजनिक उद्देश्य के लिए दशकों से उपयोग में हो, लेकिन सरकार भूमि का अधिग्रहण किए बिना और मुआवजा दिए बिना उस पर कब्जा नहीं कर सकती।

अदालत ने कहा,

“राज्य भूमि अधिग्रहण की वैधानिक प्रक्रिया अपनाए बिना और मुआवजा दिए बिना नहर बनाने या उसे ईंट और सीमेंट से पक्का करने के लिए निजी जमीन का उपयोग नहीं कर सकता। सरकार का दायित्व है कि वह भूमि के वैध मालिकों को उचित मुआवजा दे।”

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य बिना किसी नोटिस और मुआवजा दिए नागरिकों की जमीन पर कब्जा नहीं कर सकता, भले ही उसका उपयोग सिंचाई जैसी सार्वजनिक परियोजना के लिए किया जा रहा हो।

अदालत ने माना कि सरकार ने सात कनाल भूमि का उपयोग तो किया, लेकिन उसका अधिग्रहण नहीं किया और न ही भूमि मालिकों को कोई भुगतान किया।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने निचली अदालतों का फैसला रद्द करते हुए हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि वह संबंधित सात कनाल भूमि को “माना हुआ अधिग्रहण” मानते हुए वर्तमान बाजार मूल्य के आधार पर मुआवजा दे। साथ ही कानून के अनुसार मिलने वाले सभी वैधानिक लाभ, जैसे सांत्वना राशि, ब्याज और अन्य देय लाभ भी तीन महीने के भीतर भूमि मालिकों को अदा किए जाएं।

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