भूमि अधिग्रहण मुआवजा तय करने में अदालतें धारा 26 के मानकों से बंधी नहीं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

Update: 2026-06-20 07:06 GMT

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण मामलों में मुआवजा बढ़ाने से संबंधित संदर्भ याचिकाओं पर निर्णय करते समय अदालतें या प्राधिकरण, उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता अधिकार, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 की धारा 26 में निर्धारित बाजार मूल्य के मानकों से बाध्य नहीं हैं।

जस्टिस हरकेश मनुजा ने स्पष्ट किया कि धारा 26 में दिए गए मानक केवल कलेक्टर के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत हैं। ये अदालतों या प्राधिकरणों की स्वतंत्र न्यायिक शक्ति को सीमित नहीं कर सकते, जिन्हें धारा 64 के तहत मुआवजे के निर्धारण का अधिकार प्राप्त है।

अदालत ने कहा,

"धारा 26(1) के तहत निर्धारित कलेक्टर दर अधिकतम एक मार्गदर्शक कारक हो सकती है। यह राजस्व उद्देश्यों के लिए तय न्यूनतम आधार मूल्य है, इसे वास्तविक बाजार मूल्य निर्धारण का अंतिम मानक नहीं माना जा सकता। यदि अदालतों को इससे बांध दिया जाए तो यह स्थापित कानून और भूमि स्वामी को न्यायसंगत मुआवजा देने के उद्देश्य के विपरीत होगा।"

यह फैसला अंबाला जिले के बराड़ा गांव में मिनी सचिवालय निर्माण के लिए अधिग्रहित भूमि से जुड़े 19 नियमित प्रथम अपीलों पर सुनवाई के दौरान आया।

भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया वर्ष 2012 में शुरू हुई। भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने 13 अक्टूबर 2014 को पारित अपने पुरस्कार में 15 लाख रुपये प्रति एकड़ मुआवजा निर्धारित किया।

बाद में अतिरिक्त जिला जज, अंबाला ने 2 अगस्त 2024 के आदेश से मुआवजा बढ़ाकर 390 रुपये प्रति वर्ग गज कर दिया। इससे असंतुष्ट भूमि स्वामियों ने और अधिक मुआवजे की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।

सुनवाई के दौरान मुख्य प्रश्न यह था कि क्या धारा 64 के तहत संदर्भ मामलों का निर्णय करने वाली अदालतें धारा 26 में दिए गए बाजार मूल्य निर्धारण के मानकों का पालन करने के लिए बाध्य हैं।

हाईकोर्ट ने इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक देते हुए कहा कि धारा 26 केवल प्रारंभिक स्तर पर बाजार मूल्य तय करने के लिए कलेक्टर को दिशा-निर्देश देती है। जबकि प्राधिकरण और अदालतें स्वतंत्र न्यायिक संस्थाएं हैं, जिन्हें सिविल अदालत जैसी शक्तियां प्राप्त हैं।

अदालत ने कहा कि कानून ने जानबूझकर कलेक्टर और न्यायिक प्राधिकरणों की भूमिकाओं को अलग-अलग रखा है। इसलिए धारा 26 को अदालतों के लिए बाध्यकारी नहीं माना जा सकता।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 69 केवल यह कहती है कि अदालत यह देखे कि कलेक्टर ने धारा 26 के मानकों पर विचार किया या नहीं। इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत स्वयं उन्हीं मानकों का पालन करने के लिए बाध्य है।

हाईकोर्ट ने कहा कि बाजार मूल्य का निर्धारण कोई यांत्रिक या गणितीय प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उपलब्ध सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक होता है।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि धारा 26 को कठोरता से लागू किया जाए तो कई मामलों में अन्यायपूर्ण परिणाम सामने आ सकते हैं। कलेक्टर दरें केवल स्टांप शुल्क के लिए न्यूनतम मूल्य दर्शाती हैं और अक्सर वास्तविक बाजार मूल्य का सही प्रतिबिंब नहीं होतीं। इसी प्रकार बिक्री विलेखों का औसत निकालना भी तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्रों में भूमि का वास्तविक मूल्य कम करके दिखा सकता है।

कल्याणकारी कानून की भावना पर जोर देते हुए अदालत ने कहा कि 2013 के अधिनियम की व्याख्या उदारतापूर्वक की जानी चाहिए ताकि भूमि स्वामियों को उचित और न्यायपूर्ण मुआवजा मिल सके।

मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि भूमि स्वामियों द्वारा पेश किए गए बिक्री विलेख अधिग्रहित भूमि या उससे सटे क्षेत्रों से संबंधित थे। साथ ही भूमि का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण था और उसमें व्यावसायिक संभावनाएं भी थीं।

रिकॉर्ड में मौजूद बिक्री सौदों की कीमत 1000 रुपये से 1810 रुपये प्रति वर्ग गज के बीच थी। अदालत ने इन सौदों का औसत निकालने को उचित माना। आवश्यक वार्षिक मूल्य वृद्धि और छोटे भूखंडों के आधार पर 60 प्रतिशत कटौती लागू करने के बाद अदालत ने भूमि का उचित बाजार मूल्य 608 रुपये प्रति वर्ग गज निर्धारित किया।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि इस अधिग्रहण में राज्य को किसी अतिरिक्त विकास कार्य पर खर्च नहीं करना था, इसलिए विकास कटौती लागू करने का कोई आधार नहीं बनता।

फलस्वरूप अदालत ने निचली अदालत के आदेश में संशोधन करते हुए भूमि स्वामियों को 608 रुपये प्रति वर्ग गज की दर से मुआवजा देने का निर्देश दिया। साथ ही उन्हें भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत उपलब्ध सभी वैधानिक लाभ, ब्याज और सांत्वना राशि भी देने का आदेश दिया।

इसी के साथ भूमि स्वामियों की अपीलें स्वीकार की गईं।

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