कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर दोबारा नौकरी पाने वाले पूर्व सैनिक सिविल पेंशन के हकदार नहीं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
एक पूर्व सैनिक द्वारा अपनी सिविल दोबारा नौकरी के लिए पेंशन लाभ मांगने वाली रिट याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ़ लंबी सर्विस के आधार पर पेंशन का दावा नहीं किया जा सकता, जब तक कि अपॉइंटमेंट पक्का, स्थायी न हो और पेंशन देने वाले नियमों के तहत न आता हो।
जस्टिस हरप्रीत सिंह बरार ने कहा,
"शुरू से ही याचिकाकर्ता को इस बात की जानकारी थी कि वह एक अस्थायी कर्मचारी है, जिसकी सेवाएं किसी भी समय खत्म की जा सकती हैं। इसलिए ऐसा कोई मौका नहीं आया, जहां उसे अपनी नौकरी की प्रकृति के आधार पर एक स्थायी और नियमित कर्मचारी के रूप में माने जाने की वैध उम्मीद हो सकती थी। ऐसे में यह बिल्कुल साफ है कि याचिकाकर्ता अपनी नियुक्ति की प्रकृति या लागू नियमों और विनियमों के अनुसार किसी भी पेंशन या पेंशन लाभ का हकदार नहीं है।"
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता भारतीय सेना के पूर्व कमीशंड ऑफिसर, जो नवंबर 1997 में रिटायर हुए, उसको मार्च 2002 में पंजाब स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (PSERC) में डिप्टी डायरेक्टर (मीडिया और हाउसकीपिंग) के रूप में दोबारा नौकरी पर रखा गया। उनकी दोबारा नौकरी मार्च, 2014 तक समय-समय पर रिन्यू की जाती रही, जिसके बाद उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर काम करना जारी रखा।
हालांकि पहले से ही मिलिट्री पेंशन मिल रही थी, याचिकाकर्ता ने 12 साल से ज़्यादा की अपनी दोबारा नौकरी के संबंध में सिविल पेंशन, ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट की मांग की। PSERC ने 12.09.2016 के एक आदेश के ज़रिए उनका दावा खारिज किया, जिसके कारण संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत यह रिट याचिका दायर की गई।
PSERC ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि यह वैधानिक नियामक निकाय है, जिसमें कोई स्थायी या पेंशन योग्य पद नहीं हैं और शुरू से ही सभी नियुक्तियां डेपुटेशन, दोबारा नौकरी या कॉन्ट्रैक्ट पर हुईं।
यह भी जोड़ा गया कि याचिकाकर्ता को पूरी तरह से अस्थायी और कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर नियुक्त किया गया, जिसमें पेंशन लाभ से इनकार करने की स्पष्ट शर्तें थीं और 23.01.1992 के लागू निर्देश जो दोबारा नौकरी पर रखे गए पूर्व सैनिकों पर लागू होते थे, उनमें पेंशन का कोई प्रावधान नहीं था। बेंच ने कहा कि PSERC ने PCS नियमों को कभी अपनाया ही नहीं था और यह भी तर्क दिया गया कि ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट याचिकाकर्ता से सरकारी स्पष्टीकरण के अधीन एक अंडरटेकिंग लेने के बाद ही जारी किए गए।
दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि जबकि पेंशन एक संवैधानिक अधिकार है, यह केवल नियुक्ति की प्रकृति सहित वैधानिक पात्रता शर्तों को पूरा करने पर ही मिलती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, जिसमें स्टेट ऑफ़ ओडिशा बनाम निरंजन साहू और यू.पी. रोडवेज रिटायर्ड ऑफिशियल्स एसोसिएशन बनाम स्टेट ऑफ़ यू.पी. शामिल हैं, पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि अकेले सेवा की अवधि पेंशन पात्रता तय नहीं करती है।
इसमें आगे कहा गया कि अस्थायी, संविदात्मक, या पुनर्नियोजन सेवा अपने आप पेंशन के लिए योग्य नहीं होती है और पेंशन का दावा तभी किया जा सकता है, जब सेवा किसी स्थायी और पेंशन योग्य पद के विरुद्ध की गई हो।
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के नियुक्ति पत्र में स्पष्ट रूप से अस्थायी कार्यकाल का उल्लेख था और PSERC का कभी भी नियमित पद बनाने का इरादा नहीं था।
लागू सेवा विनियम, जिसमें 2015 के विनियम शामिल हैं, पेंशन का प्रावधान नहीं करते हैं और 23.01.1992 के निर्देशों में भी पुनर्नियोजित पूर्व सैनिकों के लिए पेंशन लाभ की परिकल्पना नहीं की गई।
इसमें आगे कहा गया,
"इसके अलावा, याचिकाकर्ता का पेंशन और अन्य लाभों का दावा इसलिए खारिज नहीं किया गया, क्योंकि वह पहले से ही सैन्य पेंशन ले रहा था, बल्कि इसलिए कि जिस पद पर उसे फिर से नियुक्त किया गया, वह कभी भी पेंशन योग्य प्रकृति का नहीं था। अंत में नियम 3.12 भी याचिकाकर्ता की मदद नहीं करता है क्योंकि उसमें पेंशन के लिए पात्रता की शर्तें पूरी नहीं होती हैं।"
कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा ड्राफ्ट विनियमों और PCS नियमों पर निर्भरता को भी यह देखते हुए खारिज कर दिया कि वे या तो लागू नहीं थे या उन्होंने पुनर्नियोजित पेंशनभोगियों के लिए पेंशन को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया।
Title: Lt. Col. Ashok Bembey v. Punjab State Electricity Regulatory Commission and another