समझौते के आधार पर अग्रिम ज़मानत लेकर बाद में मुकरना न्यायालय के विश्वास का उल्लंघन: हाईकोर्ट ने 2022 की ज़मानत आदेश वापस लिया
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि कोई भी अभियुक्त केवल समझौते (कम्प्रोमाइज़) के आधार पर अग्रिम ज़मानत हासिल कर, बाद में न्यायालय के समक्ष दिए गए गंभीर आश्वासनों से मुकर नहीं सकता। ऐसा आचरण न्यायिक उदारता के दुरुपयोग और न्यायालयीय विश्वास के उल्लंघन के समान है। जस्टिस सुमीत गोयल ने 2022 में दी गई अग्रिम ज़मानत को वापस लेते हुए यह टिप्पणी की।
न्यायालय ने कहा कि वह एक चिंताजनक प्रवृत्ति का संज्ञान ले रहा है, जिसमें अभियुक्त “आपसी समझौते” को एक रणनीतिक हथकंडे की तरह इस्तेमाल कर विवेकाधीन राहत प्राप्त करते हैं और स्वतंत्रता मिलते ही अपने वादों से पीछे हट जाते हैं। इससे शिकायतकर्ता असुरक्षित स्थिति में आ जाता है और न्याय की प्रक्रिया ठहर-सी जाती है। यह न्यायालय की उदारता के साथ खुला खिलवाड़ है, जिसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
निजी लाभ के लिए न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग
न्यायालय ने कहा कि यदि किसी अभियुक्त को न्यायालय-स्वीकृत समझौते से मुकरने की अनुमति दी जाए, तो इससे न्यायालय के आदेश निष्प्रभावी और न्याय प्रशासन भ्रमपूर्ण हो जाएगा। ऐसे मामलों को केवल दीवानी विवाद मानना न्यायिक मशीनरी को निजी लाभ के लिए “हथियार” बनाने जैसा होगा। याचिकाकर्ता का आचरण यह दर्शाता है कि अनुपालन का वादा केवल हिरासत से बचने के लिए किया गया छल था, न कि किसी वास्तविक सद्भावना के साथ।
'लिबर्टी की खरीदारी' क़ानून की गरिमा को ठेस
न्यायालय ने इस प्रवृत्ति को “खोखले आश्वासनों के ज़रिये स्वतंत्रता की खरीदारी” बताते हुए कहा कि यह क़ानून की गरिमा को कम करती है और न्याय प्रशासन को बदनाम करती है। अभियुक्त ने न्यायालय की उदारता का पूर्वनियोजित गैर-अनुपालन की रणनीति से दुरुपयोग किया।
मामले की पृष्ठभूमि
रिकॉल (वापसी) आवेदन FIR के शिकायतकर्ता द्वारा दायर किया गया था, जिसमें 17.01.2022 के उस आदेश पर पुनर्विचार मांगा गया था, जिसके तहत धारा 420 IPC के मामले में अभियुक्त को अग्रिम ज़मानत दी गई थी। आरोप था कि JMS Investment Private Ltd के निदेशक ने चंडीगढ़ रोड, लुधियाना स्थित JMS Homes (Akmi Township) परियोजना में फ्लैट दिलाने का झांसा देकर ₹36 लाख के समझौते के तहत शिकायतकर्ता से ₹37 लाख से अधिक की राशि (नकद व चेक) ले ली, लेकिन न तो कब्ज़ा दिया गया और न ही रकम लौटाई गई।
सेशंस कोर्ट से राहत न मिलने पर अभियुक्त हाईकोर्ट आया। मध्यस्थता के दौरान 25.11.2021 को समझौता हुआ और उसी के आधार पर 17.01.2022 को अग्रिम ज़मानत दे दी गई थी, यह निर्देश देते हुए कि समझौते की शर्तों का सख्ती से पालन होगा।
समझौते के उल्लंघन पर ज़मानत वापस
बाद में शिकायतकर्ता ने दलील दी कि अभियुक्त ने जानबूझकर समझौते का पालन नहीं किया और ज़मानत केवल समझौते के आधार पर मिली थी, जिससे यह न्यायालय के साथ धोखा है। अभियुक्त ने आपत्ति की कि दंप्रसं (CrPC) में ज़मानत वापस लेने का प्रावधान नहीं है और दीवानी उपाय उपलब्ध हैं।
न्यायालय ने माना कि 2022 का ज़मानत आदेश गुण-दोष पर नहीं, बल्कि पूरी तरह समझौते पर आधारित था। जब न्यायालय किसी समझौते पर भरोसा करता है, तो वह निजी करार नहीं रह जाता, बल्कि न्यायालय के प्रति एक गंभीर आश्वासन बन जाता है। उसका उल्लंघन केवल दीवानी नहीं, बल्कि न्यायालय की गरिमा पर आघात है।
न्यायालय ने 2025 में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Gajanan Dattatray Gore v. State of Maharashtra का उल्लेख करते हुए कहा कि समझौते के आधार पर ज़मानत देने में सावधानी की आवश्यकता है; हालांकि यह निर्णय भविष्यगत है और शर्तों के उल्लंघन पर ज़मानत रद्द करने की शक्ति को कम नहीं करता।
आदेश
मामले के गुण-दोष पर गंभीर धोखाधड़ी के आरोप पाते हुए, हाईकोर्ट ने 17.01.2022 का अग्रिम ज़मानत आदेश रद्द कर दिया और मुख्य ज़मानत याचिका खारिज कर दी। अभियुक्त को 15 दिनों में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया, साथ ही नियमित ज़मानत के लिए आवेदन की स्वतंत्रता दी गई। इसके अतिरिक्त, ₹25,000 की उदाहरणात्मक लागत पंजाब राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को अदा करने का आदेश दिया गया।