वोटर लिस्ट में जीवनसाथी का नाम होना वैध हिंदू विवाह का सबूत नहीं: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट में जीवनसाथी के तौर पर किसी व्यक्ति का नाम होने से ही वैध हिंदू विवाह साबित नहीं होता। जहां विवाह पर ही विवाद हो, वहां दावा करने वाले पक्ष को यह साबित करना होगा कि विवाह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 के तहत ज़रूरी रीति-रिवाजों और परंपराओं के साथ संपन्न हुआ था।
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की डिवीजन बेंच ने एक महिला की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। महिला ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील की थी, जिसमें कहा गया कि वह प्रतिवादी की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं है।
अपीलकर्ता का कहना था कि उसकी शादी पहले प्रतिवादी के बड़े भाई सुरेश चौधरी से हुई थी। 1997 में उनकी मौत के बाद उसने दावा किया कि उसने वैशाख 2002 में प्रतिवादी (उसके छोटे भाई) से शादी की। इसके बाद उसने फैमिली कोर्ट से गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) का आदेश भी हासिल कर लिया था।
बाद में प्रतिवादी ने एक टाइटल सूट दायर कर यह घोषणा करने की मांग की कि उनके बीच कोई विवाह नहीं हुआ और अपीलकर्ता उसकी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं है। फैमिली कोर्ट ने यह पाते हुए सूट को स्वीकार कर लिया कि कथित विवाह का हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार संपन्न होना साबित नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पक्षों के बीच कानूनी रूप से वैध विवाह स्थापित करने के लिए पर्याप्त सबूत थे। कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 का हवाला देते हुए कहा कि हिंदू विवाह प्रचलित रीति-रिवाजों और परंपराओं के साथ संपन्न होना चाहिए। जहां उन रीति-रिवाजों में सप्तपदी (सात फेरे) शामिल हों, वहां सातवें कदम के साथ विवाह पूरा हो जाता है।
बेंच को अपीलकर्ता के सबूतों में गंभीर कमियां मिलीं। उसके किसी भी गवाह ने यह नहीं बताया कि कथित विवाह कब हुआ या क्या यह उनकी मौजूदगी में हुआ था। अपीलकर्ता ने खुद भी विवाह की तारीख या जगह, किए गए रीति-रिवाजों, या यहां तक कि समारोह में शामिल होने वाले पंडित और नाई के नाम भी नहीं बताए। सप्तपदी या सिंदूरदान के बारे में भी कोई सबूत नहीं था, जिन्हें कोर्ट ने कथित हिंदू विवाह के अहम पहलू बताया।
कोर्ट ने पहले के गुजारा-भत्ता आदेश पर निर्भरता को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 125 के तहत कार्यवाही गुजारा-भत्ते से संबंधित होती है और इससे विवाह की वैधता तय नहीं होती।
अपील करने वाले की ओर से वोटर-लिस्ट में दर्ज जानकारी पर भरोसा जताए जाने पर बेंच ने कहा:
“सिर्फ़ वोटर-लिस्ट में दर्ज नामों या जानकारी के आधार पर पार्टियों के बीच शादी होने की वैधता का दावा नहीं किया जा सकता। वोटर-लिस्ट में दर्ज जानकारी किसी भी तरह की वैध या मौजूदा शादी का पक्का सबूत नहीं है। मौखिक गवाही के अलावा, ऐसा कोई दूसरा सबूत पेश नहीं किया गया, जो बिना किसी शक के यह साबित कर सके कि अपील करने वाले और प्रतिवादी के बीच हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी हुई थी...”
आखिरकार हाईकोर्ट ने माना कि अपील करने वाला हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी होने की बात साबित करने में नाकाम रहा। वैध वैवाहिक संबंध साबित करने वाले ठोस सबूत न होने के कारण कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले में दखल देने से इनकार किया।
Case Title: Durgawati Devi v. Sachita Chaudhary @ Sachitanand Yadav