पटना हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि किसी भी व्यक्ति को चुनावी लाभ पाने के लिए अपनी जाति पहचान के संबंध में विरोधाभासी रुख अपनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के लिए आरक्षित सीट से चुने गए एक मुखिया को अयोग्य घोषित करने के लिए शुरू की गई कार्यवाही को सही ठहराया।

जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस शैलेंद्र सिंह की डिवीज़न बेंच 09.08.2023 को सिंगल जज द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ 'इंट्रा-कोर्ट अपील' (अदालत के भीतर की अपील) पर सुनवाई कर रही थी। उस फैसले में सिंगल जज ने अपीलकर्ता द्वारा दायर रिट याचिका खारिज की थी।

अपीलकर्ता 2021 में अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित सीट से मुखिया चुना गया। इसके बाद बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 136(2) के तहत शिकायत दर्ज की गई, जिसमें उसे अयोग्य घोषित करने की मांग की गई। शिकायत का आधार यह था कि वह EBC श्रेणी से संबंधित नहीं था।

शिकायत मिलने के बाद राज्य चुनाव आयोग ने जाति निर्धारण के मुद्दे को सक्षम 'जाति जांच समिति' (Caste Scrutiny Committee) के पास भेज दिया। कार्यवाही के दौरान, समिति ने 12.01.2023 के आदेश में यह फैसला सुनाया कि अपीलकर्ता 'कोइरी' (कुशवाहा) जाति से संबंधित है, न कि 'डांगी' (EBC) जाति से। इस फैसले ने आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने की उसकी पात्रता समाप्त कर दी।

अपीलकर्ता ने राज्य चुनाव आयोग द्वारा मामले को संदर्भित करने और जाति जांच समिति के निष्कर्षों, दोनों को चुनौती दी। उसने तर्क दिया कि ऐसे विवादों को संदर्भित करने का अधिकार क्षेत्र आयोग के पास नहीं है। इसके अलावा, समिति के निष्कर्ष मनमाने तथा सरकारी दिशानिर्देशों के विपरीत हैं। सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार, स्थानीय जांच के आधार पर जाति प्रमाण पत्र जारी करने की अनुमति होती है। आगे यह भी तर्क दिया गया कि जाति जांच समिति के समक्ष हुई कार्यवाही 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' के उल्लंघन के कारण दोषपूर्ण थी, क्योंकि अपीलकर्ता को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया और प्रासंगिक दस्तावेजों को नज़रअंदाज़ किया गया।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि इस मुद्दे की जांच सक्षम प्राधिकारी द्वारा की जा चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि अपीलकर्ता ने स्वयं ही, अलग-अलग समय पर सरकारी अभिलेखों और लेन-देन में अपनी जाति 'कोइरी' घोषित की थी। इस तथ्य ने 'डांगी' जाति से संबंधित होने के उसके दावे को ही कमज़ोर किया। हाईकोर्ट ने पाया कि सिंगल जज ने रिकॉर्ड की विस्तृत जांच की थी और सही तौर पर बुनियादी दस्तावेजों, विशेष रूप से भूमि राजस्व रिकॉर्ड (खतियान) पर भरोसा किया, जिसमें अपीलकर्ता के पूर्वज की जाति 'कोइरी' (कुशवाहा) के रूप में दर्ज थी।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसे समकालीन रिकॉर्ड को सही माना जाता है और ये जाति की स्थिति तय करने के लिए प्राथमिक साक्ष्य होते हैं। कोर्ट ने 2018 के एक भूमि सौदे में अपीलकर्ता की अपनी घोषणा का भी संज्ञान लिया, जिसमें उसने खुद को 'कोइरी' जाति का बताया।

अपीलकर्ता की दलील खारिज करते हुए कोर्ट ने फैसला सुनाया:

“सिंगल जज ने इस पहलू पर सही ध्यान दिया और अपीलकर्ता के दावे की निरंतरता और विश्वसनीयता के संबंध में एक प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला है। किसी भी व्यक्ति को दो अलग-अलग जाति पहचानों के बीच डगमगाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिसमें वह एक उद्देश्य के लिए खुद को 'कोइरी' और दूसरे उद्देश्य के लिए 'डांगी' बताता हो, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस तरह का लाभ चाहिए। ऐसा आचरण न केवल आरक्षण प्रणाली की पवित्रता को कमज़ोर करता है, बल्कि लोक प्रशासन में निष्पक्षता की जड़ पर भी प्रहार करता है।”

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि राज्य चुनाव आयोग ने स्वयं जाति विवाद पर कोई फैसला नहीं सुनाया था, बल्कि उसने केवल इस मामले को सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा था। इस प्रकार उसने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर ही कार्य किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि स्थानीय जांच के आधार पर जाति प्रमाण पत्र जारी करने की अनुमति देने वाले दिशानिर्देशों की व्याख्या इस तरह से नहीं की जा सकती, जिससे व्यक्तियों को अपनी जाति की पहचान बार-बार बदलने की छूट मिल जाए।

यह पाते हुए कि जाति जांच समिति ने सभी प्रासंगिक सामग्रियों पर विधिवत विचार किया और सिंगल जज के निष्कर्ष सुविचारित हैं, कोर्ट ने फैसला सुनाया कि इस 'इंट्रा-कोर्ट अपील' (अदालत के भीतर की अपील) में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

तदनुसार, अपील खारिज की गई।

Case Title: Manoj Prasad v. State Election Commission (Panchayat) and Ors.

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