पुरानी दुश्मनी मात्र से अभियोजन का मामला खारिज नहीं किया जा सकता, वही घटना का कारण भी हो सकती है: पटना हाईकोर्ट

Update: 2026-07-07 12:11 GMT

पटना हाईकोर्ट ने कहा है कि पक्षों के बीच पूर्व से चली आ रही दुश्मनी (Prior Enmity) मात्र इस आधार पर अभियोजन के मामले को अविश्वसनीय नहीं बनाया जा सकता। यदि वही दुश्मनी घटना के पीछे एक संभावित कारण (Motive) भी प्रस्तुत करती है, तो केवल इसी आधार पर अभियोजन के साक्ष्यों को खारिज नहीं किया जा सकता।

जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 323 सहपठित धारा 34 के तहत दोषी ठहराया गया था। हालांकि, अदालत ने मामले के तथ्यों और आरोपियों द्वारा पहले ही जेल में बिताई गई अवधि को देखते हुए उनकी सजा को पहले से भुगती गई अवधि (Period Already Undergone) तक सीमित कर दिया।

मामला 27 फरवरी 2005 का है। अभियोजन के अनुसार, शौच से लौट रहे शिकायतकर्ता पर आरोपियों ने हमला किया। आरोप था कि एक आरोपी ने खंती से उसकी पीठ पर वार किया, जबकि दूसरे ने लाठी से सिर पर हमला किया। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि घटना के दौरान उसकी सोने की चेन छीन ली गई। शोर सुनकर मौके पर पहुंची उसकी मां के साथ भी मारपीट की गई।

जांच के बाद पुलिस ने धारा 323, 324, 307, 379 और 34 IPC के तहत आरोपपत्र दाखिल किया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को केवल धारा 323/34 IPC के तहत दोषी ठहराया।

हाईकोर्ट में अपील करते हुए आरोपियों ने तर्क दिया कि दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से भूमि विवाद और आपराधिक मुकदमेबाजी चल रही थी, जिसके कारण उन्हें झूठा फंसाया गया। उन्होंने यह भी बताया कि आरोपियों में एक सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी, एक अधिवक्ता, एक शिक्षक और एक डेयरी संचालक शामिल हैं।

रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जांच में कुछ कमियां और गवाहों के बयानों में कुछ विरोधाभास अवश्य हैं, लेकिन घायल शिकायतकर्ता की गवाही और अन्य साक्ष्य यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसके साथ मारपीट हुई थी।

हालांकि अदालत ने पाया कि हत्या के प्रयास (धारा 307 IPC) और लूट (धारा 379 IPC) के आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हुए, लेकिन यह साबित हो गया कि आरोपियों ने समान आशय (Common Intention) से शिकायतकर्ता और उसकी मां को स्वेच्छा से चोट पहुंचाई।

अदालत ने कहा, "केवल इसलिए कि पक्षों के बीच पहले से दुश्मनी थी, घायल शिकायतकर्ता की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। बल्कि ऐसी दुश्मनी स्वयं घटना का कारण भी हो सकती है।"

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया और निर्देश दिया कि यदि आरोपी संशोधित सजा पूरी कर चुके हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।

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