युवाओं को जिंदगी भर अपराधी नहीं माना जाना चाहिए: नाबालिग रहते दर्ज मामले के कारण कांस्टेबल की नियुक्ति रद्द करने पर पटना हाईकोर्ट ने पुनर्विचार का दिया आदेश
पटना हाईकोर्ट ने कहा कि किसी उम्मीदवार द्वारा आपराधिक मामले की जानकारी छिपाना नियुक्ति के मामले में प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन अधिकारियों को यह भी देखना होगा कि छिपाई गई जानकारी वास्तव में कितनी महत्वपूर्ण थी। इस संबंध में निर्णय लेते समय उम्मीदवार की उम्र, आरोपों की प्रकृति और मामले की परिस्थितियों पर निष्पक्षता से विचार करना जरूरी है। अदालत ने कहा कि कम उम्र में हुई गलती के आधार पर किसी युवा को जीवनभर अपराधी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
जस्टिस पार्थ सारथी की सिंगल बेंच राहुल कुमार की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। राहुल ने बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस-6, मुजफ्फरपुर के कमांडेंट के 1 अगस्त 2025 के उस आदेश को चुनौती दी, जिसके जरिए आपराधिक मामले की जानकारी नहीं देने के आधार पर उनकी कांस्टेबल पद पर नियुक्ति रद्द कर दी गई।
राहुल ने केंद्रीय कांस्टेबल भर्ती चयन पर्षद की वर्ष 2023 की विज्ञप्ति के तहत बिहार पुलिस में भर्ती के लिए आवेदन किया। उन्होंने 21 अगस्त 2024 को हुई लिखित परीक्षा और 16 जनवरी 2025 को हुई शारीरिक परीक्षा में सफलता हासिल की। इसके बाद उन्हें बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस-6, मुजफ्फरपुर में कांस्टेबल के पद पर नियुक्ति के लिए बुलाया गया और उन्होंने 1 जून 2025 को कार्यभार संभाल लिया।
कार्यभार संभालने के बाद राहुल को चरित्र सत्यापन के लिए एक प्रपत्र भरना पड़ा, जिसमें पूछा गया कि क्या उनके खिलाफ कोई दीवानी या आपराधिक मामला दर्ज है। उन्होंने इसका जवाब नकारात्मक दिया। हालांकि, पुलिस सत्यापन के दौरान अधिकारियों को पता चला कि वह मांझागढ़ थाना कांड संख्या 24/2016 में आरोपी है। अधिकारियों ने इसे महत्वपूर्ण जानकारी छिपाने का मामला मानते हुए उनकी नियुक्ति रद्द की।
राहुल की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित प्राथमिकी में बड़ी संख्या में लोगों को आरोपी बनाया गया और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप मामूली प्रकृति के थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कथित घटना के समय वह नाबालिग थे। मामले पर गोपालगंज के किशोर न्याय बोर्ड ने विचार किया।
किशोर न्याय बोर्ड ने 17 अक्टूबर 2025 को आदेश देते हुए राहुल को अपनी गलती स्वीकार करने के बाद छितौली स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय के परिसर में 40 पौधे लगाने और एक महीने तक उनकी देखभाल करने का निर्देश दिया। पौधे उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी वन विभाग को दी गई। बोर्ड ने यह भी ध्यान में रखा था कि राहुल एक शिक्षित और अनुशासित परिवार से आते हैं, समाज में उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल शिकायत नहीं थी और उनका स्वभाव आपराधिक नहीं था।
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आपराधिक मामला वर्ष 2016 में दर्ज हुआ और राहुल को इसकी जानकारी थी। इसके बावजूद उन्होंने भर्ती आवेदन और सत्यापन प्रपत्र, दोनों में आपराधिक मामले के संबंध में पूछे गए सवाल का जवाब 'नहीं' दिया।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले अवतार सिंह बनाम भारत संघ (2016) का उल्लेख किया। इस फैसले में स्पष्ट किया गया कि किसी जानकारी को छिपाने का महत्व इस बात पर निर्भर करता है कि वह जानकारी वास्तव में नियुक्ति के निर्णय के लिए कितनी प्रासंगिक है। हालांकि, जानकारी छिपाने वाले उम्मीदवार को नियुक्ति का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता, लेकिन नियोक्ता को उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अपने अधिकार का उचित, निष्पक्ष और विवेकपूर्ण इस्तेमाल करना चाहिए।
इन सिद्धांतों को राहुल के मामले पर लागू करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि उन्होंने आपराधिक मामले की जानकारी नहीं दी। हालांकि, अदालत ने कहा कि इस मामले में कई परिस्थितियों पर विचार किया जाना जरूरी था। FIR में कुल 85 आरोपी थे, कथित घटना के समय राहुल नाबालिग थे, उनके खिलाफ आरोप गंभीर प्रकृति के नहीं थे और किशोर न्याय बोर्ड ने उन्हें पौधे लगाने तथा उनकी देखभाल करने का निर्देश देकर मामले का निपटारा किया।
अदालत ने यह संभावना भी ध्यान में रखी कि राहुल ने सरकारी नौकरी से स्वतः अयोग्य ठहराए जाने के डर से मामले की जानकारी छिपाई हो सकती है। हाईकोर्ट ने कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप किसी भी स्तर पर गंभीर प्रकृति के नहीं कहे जा सकते। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि युवाओं की ऐसी गलतियों के लिए उन्हें जीवनभर अपराधी करार देने के बजाय उनकी भूल को माफ करने के आधुनिक दृष्टिकोण पर विचार किया जाना चाहिए।
राहुल की उम्र, उनके आचरण, आरोपों की प्रकृति और किशोर न्याय बोर्ड की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने उनकी नियुक्ति रद्द करने के आदेश पर दोबारा विचार करने की जरूरत बताई। अदालत ने कमांडेंट, बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस-6, मुजफ्फरपुर द्वारा 1 अगस्त 2025 को पारित आदेश रद्द किया।
हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे अदालत की टिप्पणियों और मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद नए सिरे से आदेश पारित करें। यह प्रक्रिया अदालत के आदेश की प्रति प्राप्त होने या प्रस्तुत किए जाने की तारीख से चार महीने के भीतर पूरी करनी होगी।
इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने राहुल कुमार की याचिका स्वीकार की।
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