पहले ही जमानत पर रिहा हो चुका आरोपी दोबारा अग्रिम जमानत नहीं मांग सकता, सरेंडर कर नियमित जमानत लेनी होगी: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि जो आरोपी अग्रिम जमानत मिलने के बाद संबंधित अदालत में सरेंडर कर जमानत बांड जमा कर चुका है और जमानत पर रिहा हो गया, वह बाद में दोबारा अग्रिम जमानत की मांग नहीं कर सकता। ऐसे आरोपी को अदालत में सरेंडर कर नियमित जमानत के लिए आवेदन करना होगा।
जस्टिस जितेंद्र कुमार की एकलपीठ गौरा थाना कांड संख्या 54/2024 से जुड़े अग्रिम जमानत आवेदन पर सुनवाई कर रही थी। यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 384 के तहत दर्ज किया गया था।
याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट ने 2 अप्रैल 2025 को अग्रिम जमानत दी थी। आदेश में शर्त रखी गई कि यदि आरोपी ने अपने किसी आपराधिक पूर्ववृत्त की जानकारी होने के बावजूद उसे छिपाया है, तो निचली अदालत उसका जमानत बांड रद्द कर सकती है।
आरोपी के खिलाफ पहले से तीन आपराधिक मामले दर्ज थे, लेकिन उसने अनजाने में अपनी जमानत याचिका में परिवाद मामला संख्या 2274/2021 का उल्लेख नहीं किया। इसके बाद निचली अदालत ने उसका जमानत बांड रद्द कर गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया। आरोपी ने इस आदेश को सेशंस कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 6 जनवरी 2026 को अपनी आपराधिक पुनरीक्षण याचिका वापस ले ली। इसके बाद उसने फिर से अग्रिम जमानत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि तीसरे आपराधिक मामले का उल्लेख न करना जानबूझकर की गई गलती या लापरवाही नहीं थी, बल्कि अनजाने में ऐसा हुआ था। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता सरकारी कर्मचारी है और हिरासत में लिए जाने से उसकी नौकरी पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
वहीं, राज्य सरकार और सूचक की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि आरोपी पहले ही हाईकोर्ट के अग्रिम जमानत आदेश के तहत निचली अदालत में सरेंडर कर चुका था, जमानत बांड जमा कर चुका था और जमानत पर रिहा भी हो गया था। ऐसे में वह कानून की नजर में अदालत की निगरानी में हिरासत में माना जाएगा और दोबारा अग्रिम जमानत की मांग नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने इस दलील से सहमति जताई। अदालत ने कहा कि जब कोई आरोपी अदालत में सरेंडर कर जमानत बांड जमा करने के बाद रिहा हो जाता है तो वह अपने जमानतदारों के माध्यम से अदालत की वैधानिक हिरासत में माना जाता है। ऐसी स्थिति में उसके लिए अग्रिम जमानत याचिका दाखिल करना स्वीकार्य नहीं है।
इस संबंध में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले मनीष जैन बनाम हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, (2020) 20 एससीसी 123 का भी हवाला दिया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत पर रिहा व्यक्ति पहले से ही कानून की वैधानिक हिरासत में होता है, इसलिए वह गिरफ्तारी की आशंका के आधार पर अग्रिम जमानत नहीं मांग सकता।
इन तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर पटना हाईकोर्ट ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को सुनवाई योग्य नहीं मानते हुए खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने आरोपी को दो सप्ताह के भीतर निचली अदालत में सरेंडर कर नियमित जमानत मांगने की छूट दी। साथ ही निचली अदालत से अनुरोध किया कि नियमित जमानत आवेदन दाखिल होने के दिन ही उस पर विचार किया जाए।