रामदेव के अनुयायी होने मात्र से मानहानि का मुकदमा नहीं कर सकते, पटना हाईकोर्ट ने किताब के प्रकाशक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की
पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति के अनुयायी या शिष्य होने मात्र से उसे उस व्यक्ति की कथित मानहानि के मामले में आपराधिक मुकदमा दायर करने का अधिकार नहीं मिल जाता। आपराधिक मानहानि की शिकायत वही व्यक्ति कर सकता है, जो कथित मानहानिकारक बयान से स्वयं प्रभावित हुआ हो। केवल व्यक्तिगत भावनाएं आहत होने या किसी व्यक्ति से जुड़ाव होने के आधार पर कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती।
जस्टिस आलोक कुमार सिन्हा की सिंगल बेंच ने स्वामी रामदेव पर लिखी गई किताब गॉडमैन टू टाइकून: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ स्वामी रामदेव के प्रकाशक जगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की।
मामले में अमित कुमार नाम के व्यक्ति ने 6 सितंबर 2017 को वैशाली जिले के हाजीपुर स्थित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का कहना था कि उसने 1 सितंबर 2017 को किताब के कवर पर स्वामी रामदेव की तस्वीर देखकर इसे खरीदा था। किताब पढ़ने के बाद उसे लगा कि इसमें स्वामी रामदेव के बारे में कुछ मानहानिकारक बातें लिखी गईं।
उसने आरोप लगाया कि किताब में अप्रत्यक्ष रूप से स्वामी रामदेव को गुरु शंकरानंद, स्वामी योगानंद और राजीव दीक्षित की मौतों के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। इसके अलावा, किताब में स्वामी रामदेव के चित्रण और उनके भगवा वस्त्र पहनने से जुड़े उल्लेखों से हिंदू धार्मिक भावनाएं आहत होने का आरोप भी लगाया गया।
शिकायतकर्ता और दो गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद मजिस्ट्रेट ने 7 और 9 अक्टूबर 2017 के आदेशों के जरिए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295ए, 500, 501 और 502 के तहत अपराधों का संज्ञान लिया था। इन आदेशों को चुनौती देते हुए जगरनॉट बुक्स ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
प्रकाशक की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट आशीष गिरि ने दलील दी कि शिकायत कानूनी रूप से सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि किताब में लगाए गए कथित मानहानिकारक आरोप शिकायतकर्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि स्वामी रामदेव के खिलाफ थे। दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 199(1) के अनुसार, आपराधिक मानहानि के मामले में शिकायत उसी व्यक्ति की ओर से दर्ज कराई जानी चाहिए, जो कथित अपराध से प्रभावित हुआ हो।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि धारा 199(1) में इस्तेमाल किया गया 'पीड़ित व्यक्ति' का अर्थ अनिवार्य कानूनी शर्त है, महज औपचारिकता नहीं। किसी व्यक्ति का अनुयायी या शिष्य होने से वह कथित रूप से मानहानि का शिकार हुए व्यक्ति की जगह नहीं ले सकता।
कोर्ट ने कहा,
"शिकायतकर्ता केवल इसलिए कथित रूप से मानहानि के शिकार व्यक्ति की जगह नहीं ले सकता, क्योंकि वह उसका शिष्य या अनुयायी है। धारा 199(1) की कानूनी शर्त को व्यक्तिगत भावनाओं या जुड़ाव के आधार पर विस्तारित नहीं किया जा सकता।"
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले जी. नरसिम्हन, जी. कस्तूरी और के. गोपालन बनाम टी.वी. चोकप्पा का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कथित मानहानिकारक बयान में किसी निश्चित और स्पष्ट रूप से पहचाने जा सकने वाले वर्ग को निशाना बनाया गया है, तो उस वर्ग का सदस्य भी शिकायत दर्ज करा सकता है। हालांकि, मौजूदा मामले में यह शर्त पूरी नहीं होती थी।
अदालत ने पाया कि किताब में लगाए गए कथित आरोप व्यक्तिगत रूप से स्वामी रामदेव से संबंधित थे। शिकायतकर्ता ने यह नहीं बताया कि किताब में कोई ऐसी टिप्पणी की गई, जिससे उसके अपने चरित्र, आचरण या प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा हो।
कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल यह दावा करना कि आध्यात्मिक गुरु के बारे में लिखी गई बातों से उनके अनेक अनुयायियों की भावनाएं आहत हुई हैं, उन्हें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 499 के स्पष्टीकरण 2 के तहत कोई निश्चित और पहचान योग्य वर्ग नहीं बना देता।
अदालत के अनुसार, स्वामी रामदेव के साथ शिकायतकर्ता का जुड़ाव और किताब को लेकर उसकी व्यक्तिगत भावनाएं उसे आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर करने का कानूनी अधिकार नहीं देतीं।
इन टिप्पणियों के साथ पटना हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट की ओर से 7 और 9 अक्टूबर 2017 को पारित संज्ञान आदेशों को रद्द किया। साथ ही जगरनॉट बुक्स के खिलाफ शुरू की गई उनसे जुड़ी सभी परिणामी आपराधिक कार्यवाहियां भी निरस्त कीं।