गैंगरेप मामले में FIR में 2 महीने की देरी से पूरी घटना खारिज नहीं हो सकती: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने कहा है कि गैंगरेप के मामले में FIR दर्ज करने में दो महीने की देरी इतनी असाधारण नहीं है कि केवल इसी आधार पर पूरी घटना को अविश्वसनीय मान लिया जाए।
जस्टिस चंद्रशेखर झा की एकल पीठ आरोपी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें विशेष न्यायाधीश, SC/ST, पटना द्वारा 27 नवंबर 2018 को लिए गए संज्ञान के आदेश को चुनौती दी गई थी। आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 376(D), SC/ST Act की धारा 3(2)(va) और IT Act की धारा 67 के तहत मामला दर्ज था।
अभियोजन के अनुसार, पीड़िता अपने मामा के घर जा रही थी, तभी चार-पांच लोगों ने कथित तौर पर उसके साथ गैंगरेप किया। FIR के अनुसार, पीड़िता ने आरोपियों के नाम घटना के दौरान एक-दूसरे को संबोधित करते हुए सुने थे। बाद में उसने रामायण मांझी से उनके नामों की पुष्टि की, जिसके बाद FIR दर्ज की गई।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मामला मनगढ़ंत है और FIR में घटना की तारीख और समय स्पष्ट नहीं है। यह भी तर्क दिया गया कि FIR दो महीने बाद दर्ज की गई और आरोपियों की पहचान रामायण मांझी द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर की गई थी, जिससे पीड़िता ने बाद में शादी कर ली।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि रामायण मांझी से पीड़िता का बाद में विवाह होना अभियोजन के मामले को प्रभावित नहीं करता, क्योंकि FIR के अनुसार वह घटना से पहले से ही पीड़िता की जान-पहचान में था।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा, “गैंगरेप के मामले में दो महीने की देरी ऐसी असाधारण देरी नहीं है, जिसके आधार पर पूरी घटना को अविश्वसनीय मान लिया जाए।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जांच के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की थी और ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लिया था। सुप्रीम कोर्ट के State of Haryana v. Bhajan Lal के सिद्धांतों को देखते हुए हाईकोर्ट ने संज्ञान आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं पाया।
हाईकोर्ट ने आरोपी की FIR और आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की याचिका खारिज कर दी।