गैंगरेप मामले में 4 दोषियों को पटना हाईकोर्ट ने किया बरी, कहा- पांच लोगों ने बारी-बारी रेप किया होता तो शरीर पर चोटें जरूर होतीं
पटना हाईकोर्ट ने गैंगरेप मामले में दोषी ठहराए गए चार आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन की कहानी मेडिकल साक्ष्यों से पुष्ट नहीं होती और मामले में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं।
जस्टिस जी. अनुपमा चक्रवर्ती की एकल पीठ ने वर्ष 2004 में हुई दोषसिद्धि को रद्द करते हुए कहा कि यदि पांच आरोपियों ने पीड़िता के साथ एक के बाद एक बलात्कार किया होता, तो उसके शरीर पर कुछ चोटें मिलनी चाहिए थीं।
यह मामला 1998 का है, जिसमें पांच लोगों पर महिला के साथ सामूहिक बलात्कार का आरोप लगा था। ट्रायल कोर्ट ने सभी को IPC की धारा 376(2)(g) के तहत दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। अपील वर्ष 2004 से लंबित थी। सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो गई।
अभियोजन के अनुसार, 17-18 मई 1998 की रात आरोपियों ने पीड़िता और उसकी भतीजी को पंचायत में चलने के लिए बुलाया। रास्ते में उन्हें कथित तौर पर एक बगीचे की ओर ले जाया गया, जहां भतीजी भागने में सफल रही और पांचों आरोपियों ने पीड़िता के साथ कथित रूप से एक के बाद एक बलात्कार किया।
हाईकोर्ट ने पाया कि मेडिकल रिपोर्ट पीड़िता की मौखिक गवाही का समर्थन नहीं करती थी। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पीड़िता की जांच करने वाले डॉक्टर को अभियोजन पक्ष ने गवाह के रूप में पेश नहीं किया।
कोर्ट ने अभियोजन के गवाहों के बयानों में घटना के समय, पंचायत के आयोजन और घटनास्थल को लेकर भी महत्वपूर्ण विरोधाभास पाए। इसके अलावा, कोर्ट ने आरोप तय करने और बाद में दोषसिद्धि के लिए लगाई गई IPC की धाराओं में भी विसंगति का उल्लेख किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में अभियोजन को आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित करना होता है और जब तक अपराध साबित न हो, आरोपी निर्दोष माना जाता है।
इन परिस्थितियों में अभियोजन द्वारा आरोप साबित करने में विफल रहने पर कोर्ट ने चारों surviving appellants की दोषसिद्धि और सजा रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया।