पटना हाईकोर्ट ने 8 साल पहले दी गई अग्रिम जमानत रद्द की, कहा - शपथ पर दिया गया झूठा बयान माफ नहीं किया जा सकता
पटना हाईकोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति अग्रिम जमानत मांगते समय शपथ पर झूठा बयान देता है, वह यह तर्क देकर अपनी गलत बयानी को सही नहीं ठहरा सकता कि जमानत अर्जी के साथ लगी FIR में सही तथ्य पहले ही बता दिए गए। कोर्ट ने लगभग आठ साल पहले दी गई अग्रिम जमानत रद्द कr। कोर्ट ने कहा कि बाद में कोई गलत काम न करने का मतलब यह नहीं है कि झूठ बोलकर हासिल किया गया आदेश वैध हो जाएगा।
जस्टिस संदीप कुमार की सिंगल बेंच ने कहा कि जो व्यक्ति कोर्ट से कोई विशेष राहत (Discretionary Relief) मांगता है, उसे सभी जरूरी तथ्यों को पूरी तरह, ईमानदारी से और स्पष्ट रूप से सामने रखना चाहिए। वह झूठे बयानों का पता लगाने की जिम्मेदारी कोर्ट पर नहीं डाल सकता।
कोर्ट CrPC की धारा 439(2) के तहत एक अर्जी पर सुनवाई कर रही थी। इसमें अमित कुमार उर्फ अमित कुमार साहनी को दी गई अग्रिम जमानत रद्द करने की मांग की गई। यह मामला जमीन के सौदे से जुड़ा है, जिसमें धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश के आरोप हैं।
यह विवाद आरोपी के चाचा की शिकायत से शुरू हुआ। उनका आरोप है कि उन्होंने हाजीपुर में अपनी पुश्तैनी जमीन बेचने का काम अपने भतीजे (आरोपी) को सौंपा था। शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपी ने संपत्ति का एक हिस्सा खुद खरीदने, अन्य खरीदार खोजने और कुल 49.73 लाख रुपये बैंकिंग माध्यम से चुकाने पर सहमति जताई। शिकायतकर्ता का आरोप है कि 14 सितंबर 2017 को चार सेल डीड (बिक्री विलेख) निष्पादित किए गए, लेकिन उसे पैसे कभी नहीं मिले। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सेल डीड में गलत तरीके से यह दर्ज किया गया कि पूरी रकम का भुगतान पहले ही किया जा चुका है।
आरोपी ने पहले अग्रिम जमानत के लिए सेशन कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसे अगस्त 2018 में खारिज कर दिया गया। इसके बाद वह हाईकोर्ट गया और दिसंबर 2018 में अग्रिम जमानत हासिल कर ली। हालांकि, शिकायतकर्ता ने जमानत रद्द करने की मांग की। उनका तर्क था कि आरोपी ने शपथ पर झूठ बोला था कि वह सेल डीड में केवल एक 'पहचानकर्ता' (Identifier) था, न तो विक्रेता और न ही खरीदार।
शिकायतकर्ता ने बताया कि आरोपी खुद विवादित ज़मीन के सबसे बड़े हिस्से (32.75 डेसिमल) का खरीदार था। उसने 29.48 लाख रुपये में एक रजिस्टर्ड सेल डीड (बिक्री विलेख) के ज़रिए यह ज़मीन खरीदी थी। हाई कोर्ट ने पाया कि दस्तावेज़ी सबूतों से यह साबित हो गया कि आरोपी ने गलत बयान दिया था। कोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि उसे 29.48 लाख रुपये की उस रजिस्टर्ड सेल डीड के बारे में पता नहीं था, जो उसके अपने पक्ष में बनी थी।
ज़मानत रद्द किए जाने का विरोध करते हुए आरोपी ने दलील दी कि उसकी ज़मानत अर्ज़ी के साथ लगी FIR में सही तथ्य पहले ही बता दिए गए। उसने यह भी कहा कि ज़मानत तब तक रद्द नहीं की जा सकती, जब तक कि बाद में कोई गलत काम न किया गया हो, मिली आज़ादी का गलत इस्तेमाल न किया गया हो, या गवाहों को डराया-धमकाया न गया हो।
FIR को साथ लगाने को ही 'पूरी जानकारी देना' मानने की दलील खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:
“यह दलील कि कोई ज़रूरी तथ्य छिपाया नहीं गया—क्योंकि याचिका के साथ लगी FIR की कॉपी में सही तथ्य मौजूद थे और संबंधित बेंच ने भी रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखने की बात कही थी—कोर्ट को स्वीकार्य नहीं है। यह एक स्थापित सिद्धांत है कि जो व्यक्ति कोर्ट से कोई राहत (Discretionary Relief) मांगता है, उसे सभी ज़रूरी तथ्यों का पूरा और ईमानदारी से खुलासा करना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि कोर्ट याचिका में दी गई बातों और शपथ-पत्रों में किए गए दावों पर भरोसा करके ही आगे बढ़ता है। अगर कोई पक्ष शपथ लेकर ऐसा दावा करता है जो उसके द्वारा ही जमा किए गए दस्तावेज़ों के उलट है तो वह यह नहीं कह सकता कि उस दावे के गलत होने का पता लगाना कोर्ट का काम था।”
कोर्ट ने बाद में किए गए गलत व्यवहार के आधार पर ज़मानत रद्द करने और धोखाधड़ी या गलत जानकारी देकर हासिल की गई ज़मानत रद्द करने के बीच का अंतर भी स्पष्ट किया। कोर्ट ने समझाया कि बाद के व्यवहार के आधार पर ज़मानत रद्द करने के लिए बहुत ठोस और मज़बूत कारणों की ज़रूरत होती है, जबकि गलत तथ्य बताकर हासिल किया गया ज़मानत आदेश शुरू से ही दोषपूर्ण होता है। ऐसा आदेश कानूनी रूप से शून्य (Nullity) होता है, और इसे वापस लेने का मतलब यह नहीं है कि कोर्ट अपने पहले लिए गए फैसले (Judicial Discretion) की समीक्षा कर रहा है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने माना कि अग्रिम जमानत लगभग आठ साल पहले दी गई और इसे रद्द करने की अर्जी अप्रैल 2019 से लंबित थी, जिसका कारण किसी भी पक्ष की गलती नहीं थी। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि जमानत मिलने के बाद आरोपी द्वारा इस छूट का कोई दुरुपयोग किए जाने का आरोप नहीं लगाया गया। हालांकि, बेंच ने कहा कि इन परिस्थितियों के आधार पर जमानत आदेश की मूल खामी को ठीक नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यह कोर्ट इस बात से अवगत है कि विवादित आदेश लगभग आठ साल पहले पारित किया गया और वर्तमान अर्जी अप्रैल 2019 से लंबित है, जिसका कारण किसी भी पक्ष की गलती नहीं है, और यह भी कि जमानत का कोई दुरुपयोग नहीं हुआ है। ये ऐसी परिस्थितियां हैं, जिन पर कोर्ट तब विचार कर सकता है जब बाद में किए गए किसी कदाचार के कारण जमानत रद्द करने का सवाल उठे। लेकिन, चूंकि ये परिस्थितियां जमानत मिलने के बाद और उसी के कारण पैदा हुई हैं, इसलिए ये उस आदेश को वैध नहीं बना सकतीं जो शुरुआत में ही झूठ बोलकर हासिल किया गया हो…”
इसके अनुसार, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 4 दिसंबर 2018 का अग्रिम जमानत आदेश, जमीन के सौदे में आरोपी की भूमिका के बारे में जानबूझकर शपथ पर दिए गए झूठे बयान के जरिए हासिल किया गया।
अर्जी स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने अपने पहले के अग्रिम जमानत आदेश को वापस ले लिया और उसे रद्द कर दिया। साथ ही अमित कुमार उर्फ अमित कुमार साहनी को दी गई जमानत खारिज की और उनके द्वारा जमा किए गए जमानत बॉन्ड को भी रद्द किया।
Case Title : Ram Ayodhya Sahani v. State of Bihar and Anr