पटना हाईकोर्ट ने कहा कि किसी छात्र को स्कूल से निकालने के मामले में प्राइवेट बिना सरकारी मदद वाले (Unaided) स्कूल के खिलाफ रिट याचिका दायर की जा सकती है, क्योंकि शिक्षा देते समय एक शिक्षण संस्थान सार्वजनिक काम (Public Function) करता है।

जस्टिस हरीश कुमार की सिंगल जज बेंच ने कहा कि हालांकि शिक्षण संस्थानों में अनुशासन ज़रूरी है, लेकिन स्कूलों को यह भी याद रखना चाहिए कि नाबालिग छात्र अपनी ज़िंदगी के बनने-बिगड़ने वाले दौर (Formative Stage) में होते हैं। अगर गलत व्यवहार को सुधारा जा सकता है तो आम तौर पर छात्र को निकालने के बजाय सुधारने और सही करने का तरीका अपनाना चाहिए।

कोर्ट ने यह बात डॉन बॉस्को एकेडमी, पटना के नौवीं कक्षा के छात्र को स्कूल से निकाले जाने का फैसला रद्द करते हुए कही। कोर्ट ने स्कूल को निर्देश दिया कि वह छात्र को दोबारा क्लास में शामिल होने और पढ़ाई-लिखाई से जुड़ी गतिविधियों में हिस्सा लेने की इजाज़त दे। शुरू में छात्र को सस्पेंड कर दिया गया था और क्लास में आने से रोक दिया गया। उसके पिता ने 2025-26 एकेडमिक सेशन की फाइनल टर्म परीक्षाओं से पहले हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि अगर छात्र को परीक्षा में बैठने की इजाज़त नहीं मिली तो उसका पूरा एकेडमिक सेशन बर्बाद हो सकता है। यह भी बताया गया कि छात्र को स्कूल से निकाले जाने के बारे में तो बता दिया गया, लेकिन शुरू में कोई औपचारिक आदेश या कारण नहीं बताया गया।

फरवरी में हाईकोर्ट ने एक अंतरिम आदेश जारी करके छात्र को फाइनल टर्म परीक्षा में बैठने की इजाज़त दी थी, जो मामले की आगे की कार्यवाही के नतीजे पर निर्भर था।

स्कूल ने याचिका के स्वीकार्य होने (Maintainability) पर शुरुआती आपत्ति जताई। उसने तर्क दिया कि वह एक प्राइवेट बिना सरकारी मदद वाला संस्थान है और जिस कार्रवाई को चुनौती दी गई है, उसमें कोई सार्वजनिक पहलू या सार्वजनिक कर्तव्य शामिल नहीं है।

आपत्ति खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि CBSE/ICSE से जुड़े स्कूलों के खिलाफ रिट याचिकाओं के स्वीकार्य होने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में विचार किया गया। कोर्ट ने माना कि बिना सरकारी मदद वाला माइनॉरिटी स्कूल भी बच्चों को शिक्षा देते समय सार्वजनिक काम करता है। इसलिए एडमिशन, फीस और - उचित मामलों में - स्कूल से निकालने से जुड़े फैसलों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है, अगर संस्थान ने निष्पक्ष, उचित और कानून के मुताबिक काम नहीं किया।

अदालत ने कहा:

“बिना सरकारी मदद वाले माइनॉरिटी स्कूल भी बच्चों को शिक्षा देते समय ऐसा सार्वजनिक काम करते हैं, जिसमें पब्लिक लॉ (सार्वजनिक कानून) का पहलू शामिल होता है। इसलिए ऐसे संस्थान के छात्रों के एडमिशन, फीस तय करने और - सही मामलों में - छात्रों को स्कूल से निकालने जैसे फैसलों की न्यायिक समीक्षा (ज्यूडिशियल रिव्यू) हो सकती है, अगर अथॉरिटी ने निष्पक्ष, उचित और कानून के अनुसार काम नहीं किया हो…”

अदालत ने आगे कहा कि ऐसी कार्रवाई को "संविधान के आर्टिकल 14 में शामिल निष्पक्षता और उचित व्यवहार के सिद्धांतों की कसौटी पर खरा उतरना ही चाहिए।" मामले के तथ्यों पर बात करते हुए स्कूल ने आरोप लगाया कि छात्र ने बार-बार क्लास छोड़ी (बंक की) और टीचरों की चेतावनियों और सलाह को नहीं माना। स्कूल ने यह भी आरोप लगाया कि पिता के भरोसे के बावजूद, छात्र बाद में एक दूसरे छात्र से झगड़ पड़ा और ज़्यादा आक्रामक हो गया, जिससे स्कूल के पास उसे निकालने के अलावा कोई चारा नहीं बचा।

हाईकोर्ट ने गौर किया कि हालांकि स्कूल के नियमों में गलत व्यवहार के कई ऐसे कामों का ज़िक्र था, जिनके लिए छात्र को निकाला जा सकता था, लेकिन सिर्फ़ क्लास बंक करने को खास तौर पर ऐसा अपराध नहीं बताया गया, जिसके लिए इतनी कड़ी सज़ा दी जाए। छात्रों के बीच झगड़ों के बारे में अदालत ने कहा कि ऐसी घटनाएं कभी-कभी "बच्चों के बीच पल भर के गुस्से, नासमझी या छोटी-मोटी बहस" का नतीजा हो सकती हैं। ऐसी हर घटना के लिए उसकी प्रकृति, गंभीरता और आसपास के हालात पर विचार किए बिना, सीधे छात्र को निकाल देना सही नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि अनुशासनात्मक कार्रवाई गलत व्यवहार के अनुपात में होनी चाहिए।

अदालत ने ज़ोर दिया कि छात्र "देश के कीमती मानव संसाधन" हैं और अनुशासनात्मक फैसले लेते समय उनकी उम्र, समझदारी और हालात का ध्यान रखा जाना चाहिए। जहां गलत व्यवहार को काउंसलिंग, चेतावनी, निगरानी या कम सख़्त अनुशासनात्मक उपायों से सुधारा जा सकता है, वहां स्कूलों को आम तौर पर सज़ा देने के बजाय सुधारने वाला तरीका अपनाना चाहिए।

नाबालिगों के मामले में शिक्षण संस्थानों की भूमिका पर कोर्ट ने कहा:

“शिक्षण संस्थान के अधिकारियों को यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि वे ऐसे नाबालिग छात्रों के साथ व्यवहार कर रहे हैं जो अभी अपने जीवन के विकास के चरण में हैं। शिक्षण संस्थान का यह कर्तव्य है कि वह न केवल शैक्षणिक शिक्षा दे, बल्कि छात्रों के व्यक्तित्व, चरित्र और व्यवहार के विकास में भी मदद करे ताकि वे जिम्मेदार और अच्छे नागरिक बन सकें।”

कोर्ट ने यह भी पाया कि स्कूल ने इतना कड़ा कदम उठाने से पहले प्राकृतिक न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों का पालन नहीं किया था। छात्र को अपने ऊपर लगे आरोपों पर सफाई देने का पर्याप्त मौका नहीं दिया गया, और स्कूल से निकाले जाने के आदेश में उसकी सफाई या कथित घटनाओं से जुड़ी परिस्थितियों पर विचार करने का कोई ज़िक्र नहीं था।

यह मानते हुए कि छात्र को अपना व्यवहार सुधारने और स्कूल के मार्गदर्शन व अनुशासन के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया देने का मौका मिलना चाहिए, कोर्ट ने स्कूल से निकाले जाने का आदेश रद्द किया और स्कूल को निर्देश दिया कि वह छात्र को कक्षाएं फिर से शुरू करने और शैक्षणिक गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति दे, जिसमें वे परीक्षाएं भी शामिल हैं जिनके लिए वह अन्यथा योग्य था।

Case Title: Satyam v. State of Bihar and Ors.

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