पटना हाईकोर्ट ने कहा कि किसी वकील पर केवल इसलिए आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, क्योंकि पेशेवर कर्तव्यों के दौरान दी गई उसकी कानूनी राय बाद में गलत साबित हो जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक जिम्मेदारी तब बन सकती है, जब कोई वकील धोखाधड़ी में मदद करने के इरादे से, दूसरों के साथ मिलकर जानबूझकर कोई गलत या गुमराह करने वाली राय दे।

जस्टिस राणा विक्रम सिंह की सिंगल बेंच ने UCO बैंक के एक पैनल वकील के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। उस वकील पर बैंक लोन धोखाधड़ी में शामिल होने का आरोप था, जिसमें कथित तौर पर जाली संपत्ति दस्तावेजों का इस्तेमाल गिरवी (कोलैटरल सिक्योरिटी) के रूप में किया गया।

कोर्ट CrPC की धारा 482 के तहत दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें पटना के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) के 21 जनवरी, 2016 के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें वकील के खिलाफ IPC की धाराओं 406, 409, 420, 467, 468, 471 और 120B के तहत अपराधों का संज्ञान लिया गया।

यह मामला दिसंबर 2008 में दर्ज एक FIR से जुड़ा है। इसे पटना में UCO बैंक की एग्जीबिशन रोड शाखा के मुख्य प्रबंधक की शिकायत पर दर्ज किया गया, जिसमें कैश-क्रेडिट सुविधाओं को मंजूर करने और बांटने में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाया गया।

आरोपों के अनुसार, कुछ बैंक अधिकारियों ने कर्ज लेने वालों और गारंटी देने वालों के साथ मिलकर गिरवी रखी गई संपत्तियों के बदले क्रेडिट सुविधाएं मंजूर की थीं। बाद में ये अकाउंट 'नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स' (NPA) बन गए, जिससे बैंक को नुकसान हुआ। आरोप यह भी था कि गिरवी रखी गई संपत्तियां असली नहीं थीं और उनके मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज फर्जी और मनगढ़ंत थे।

याचिकाकर्ता, जिनके पास 35 वर्षों से अधिक का पेशेवर अनुभव है, बैंक के पैनल वकील के रूप में काम कर चुके थे। उन्होंने 2003 और 2002 में क्रमशः दो कर्जदारों - M/s जय माता दी और M/s न्यू आदर्श मेडिकल हॉल - के संबंध में कानूनी राय दी थी।

वकील ने तर्क दिया कि उन्होंने बैंक को स्पष्ट रूप से सलाह दी थी कि उनकी कानूनी राय के आधार पर कोई कदम उठाने से पहले, बैंक को मूल संपत्ति दस्तावेजों की स्वतंत्र रूप से जांच कर लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि लोन मंजूर करने और बांटने का फैसला पूरी तरह से बैंक अधिकारियों का था, और इस फैसले को लेने की प्रक्रिया में उनकी कोई भूमिका नहीं थी।

हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या किसी वकील को सिर्फ इसलिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, क्योंकि उसने बैंक लोन के लिए सिक्योरिटी के तौर पर दी गई संपत्ति के बारे में कोई कानूनी राय दी थी? वकीलों की पेशेवर जिम्मेदारियों पर गौर करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक वकील का अपने क्लाइंट के प्रति 'ड्यूटी ऑफ केयर' (सावधानी बरतने का कर्तव्य) होता है। अगर कोई वकील लापरवाही से या जरूरी दस्तावेजों की जांच किए बिना अपनी राय देता है, तो उसे 'प्रोफेशनल नेग्लिजेंस' (पेशेवर लापरवाही) के नतीजों का सामना करना पड़ सकता है।

हालांकि, कोर्ट ने 'पेशेवर लापरवाही' और 'आपराधिक जिम्मेदारी' वाले आचरण के बीच फर्क स्पष्ट किया।

कोर्ट ने कहा:

“एक वकील का अपने क्लाइंट के प्रति 'ड्यूटी ऑफ केयर' होता है। अगर वह लापरवाही से बिना तथ्यों की जांच और पुष्टि किए अपनी राय देता है तो उस पर 'पेशेवर लापरवाही' के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। यह कार्रवाई जिला बार एसोसिएशन, स्टेट बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया जैसी सक्षम संस्थाओं द्वारा की जा सकती है। इसके विपरीत, किसी वकील को सिर्फ इसलिए सजा नहीं दी जा सकती कि उसकी दी गई राय गलत साबित हुई, या फिर बाद में कोर्ट ने कानून को किसी अलग नजरिए से देखा।”

Case Title : Gopal Krishna Agrawal v. State of Bihar and Anr

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