एमपी हाईकोर्ट ने आदिवासी समुदाय के खिलाफ दर्ज FIR के विरोध में शामिल छात्र के खिलाफ FIR रद्द की, कहा- उसका करियर बर्बाद नहीं होना चाहिए
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 12वीं कक्षा के छात्र के खिलाफ दर्ज FIR, चार्जशीट और संज्ञान लेने वाला आदेश रद्द किया। इस छात्र पर आरोप था कि उसने आदिवासी समुदाय के कुछ लोगों के खिलाफ दर्ज FIR के विरोध में प्रदर्शन के दौरान, निषेधाज्ञा (Prohibitory Orders) का उल्लंघन किया और सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डाली। [2026 LiveLaw (MP) 448]
जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की बेंच ने कहा कि एक होनहार छात्र को बेवजह आपराधिक कार्यवाही में नहीं घसीटा जाना चाहिए, क्योंकि इससे एक मामूली वजह से उसका पूरा करियर बर्बाद हो सकता है।
कोर्ट ने कहा:
"याचिकाकर्ता एक होनहार छात्र है, जिसने 12वीं कक्षा में पांच में से चार विषयों में डिस्टिंक्शन (विशेष योग्यता) हासिल की। ऐसे होनहार छात्र को बेवजह आपराधिक कार्यवाही में नहीं घसीटा जाना चाहिए, जिससे उसका पूरा करियर बर्बाद हो जाए। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह उन छह लोगों के साथ था, जो आदिवासी समुदाय के कुछ सदस्यों के खिलाफ FIR दर्ज किए जाने का विरोध कर रहे थे। उपरोक्त निष्कर्षों और कानून की स्थापित स्थिति को देखते हुए इस कोर्ट की राय में, संज्ञान लेने वाला आदेश कानून की नजर में टिक नहीं सकता। इसलिए यह याचिका स्वीकार की जाती है। RCT नंबर 817/2024 में 16.12.2024 को पारित संज्ञान लेने वाला आदेश, थाना पलसूद (जिला बड़वानी) में अपराध क्रमांक 198/2024 के तहत दर्ज FIR और इसके परिणामस्वरूप तैयार चार्जशीट को रद्द किया जाता है।"
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 30 जून 2024 को आदिवासी समुदाय के कुछ सदस्यों के खिलाफ FIR दर्ज की गई। इस FIR से नाराज होकर 'जय आदिवासी युवा शक्ति' (JAYS) के कुछ सदस्यों ने 6 जुलाई 2024 को थाना प्रभारी के पास एक आवेदन देकर FIR रद्द करने की मांग की।
इसके बाद याचिकाकर्ता सहित JAYS के सात सदस्यों के खिलाफ एक और FIR दर्ज की गई। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि ये लोग राजपुर के सब-डिविजनल ऑफिसर (SDO) से पूर्व अनुमति लिए बिना, बैनर लेकर और नारे लगाते हुए पुलिस स्टेशन के पास इकट्ठा हुए थे। यह भी आरोप लगाया गया कि उनकी भीड़ ने बड़वानी के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 7 जून, 2024 को CrPC की धारा 144 के तहत जारी आदेश का उल्लंघन किया।
बता दें, यह धारा किसी कार्यकारी/जिला या उप-विभागीय मजिस्ट्रेट को सार्वजनिक उपद्रव को रोकने के लिए तत्काल आदेश जारी करने का अधिकार देती है। इसके चलते, उनके खिलाफ BNS की धारा 223 के तहत मामला दर्ज किया गया, जो किसी लोक सेवक द्वारा विधिवत जारी आदेश की अवहेलना से संबंधित है।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने इसमें BNS की धारा 126(2) भी जोड़ दी। आरोप लगाया गया कि इस भीड़ ने पुलिसकर्मियों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करने से रोका।
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि BNS की धारा 223 के तहत अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लिया जा सकता, जब तक कि BNS की धारा 215 का पालन न किया गया हो। धारा 215 के अनुसार, इसके लिए संबंधित लोक सेवक या अधिकृत लोक सेवक की लिखित शिकायत अनिवार्य है।
यह तर्क दिया गया कि BNS की धारा 223 और धारा 126(2) के तहत लगाए गए आरोप आपस में गहराई से जुड़े हैं और एक ही घटनाक्रम से उपजे हैं। इसलिए अभियोजन पक्ष धारा 215 (BNSS) की कानूनी आवश्यकताओं से बचने के लिए इन अपराधों को अलग-अलग नहीं कर सकता। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि यदि चार्जशीट में लगाए गए आरोपों को ज्यों का त्यों मान भी लिया जाए, तब भी BNS की धारा 126(2) के तहत अपराध के तत्व पूरे नहीं होते हैं।
राज्य पक्ष ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट में संज्ञान लिए जाने के समय यह आपत्ति नहीं उठाई थी। साथ ही यह भी कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद होने पर अपनी संतुष्टि दर्ज की थी, इसलिए याचिकाकर्ता को मुकदमे (ट्रायल) का सामना करना चाहिए।
अदालत ने गौर किया कि BNS की धारा 223 के तहत अपराध खुद स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) द्वारा दर्ज किया गया, जबकि इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट की ओर से कोई लिखित शिकायत नहीं मिली, जिनके निषेधाज्ञा आदेश का कथित तौर पर उल्लंघन हुआ था।
अदालत ने BNSS की धारा 215 का हवाला दिया। यह धारा अदालत को BNS की धारा 206 से 223 के तहत दंडनीय अपराधों का संज्ञान लेने से रोकती है, जब तक कि संबंधित लोक सेवक, या उस लोक सेवक के प्रशासनिक रूप से वरिष्ठ अधिकारी, या किसी अन्य अधिकृत लोक सेवक की ओर से लिखित शिकायत न मिले।
अदालत ने पाया कि इस मामले में ऐसी कोई लिखित शिकायत मौजूद ही नहीं है। अदालत ने यह भी जांचा कि क्या BNSS की धारा 215 का पालन न होने के बावजूद, BNS की धारा 126(2) के तहत अपराध को स्वतंत्र रूप से कायम रखा जा सकता है।
'देवेंद्र कुमार बनाम राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए अदालत ने दोहराया कि एक ही घटनाक्रम से जुड़े अलग-अलग अपराध हमेशा पूरी तरह से अलग नहीं होते। खासकर तब, जब ऐसा करने से CrPC की धारा 195 (जो अब BNSS की धारा 215 के समान है) के तहत मिलने वाला कानूनी संरक्षण ही खत्म हो जाए।
इस सिद्धांत को लागू करते हुए पीठ ने माना कि BNS की धारा 223 और 126(2) के तहत लगाए गए आरोप एक ही घटनाक्रम का अभिन्न हिस्सा हैं और इन्हें दो अलग-अलग घटनाओं में नहीं बांटा जा सकता। इसलिए पूरी घटना पर BNSS की धारा 215 की शर्तें लागू होती हैं।
पीठ ने यह भी गौर किया कि अभियोजन पक्ष द्वारा तैयार किए गए 'स्पॉट मैप' (घटनास्थल के नक्शे) से ही धारा 126(2) के तहत 'बाधा डालने' का आरोप कमजोर पड़ जाता है। इसमें देखा गया कि सात लोग पुलिस स्टेशन की इमारत से कुछ दूरी पर इकट्ठा हुए। इस तरह जांच अधिकारी द्वारा बनाए गए स्पॉट मैप से भी पुलिसकर्मियों के काम में बाधा डालने का आरोप साबित नहीं होता।
याचिकाकर्ता की शैक्षणिक उपलब्धियों पर जोर देते हुए अदालत ने देखा कि उसने 12वीं कक्षा की परीक्षा में पांच में से चार विषयों में 'डिस्टिंक्शन' (विशेष योग्यता) हासिल की थी, और 10वीं कक्षा में भी दो विषयों में डिस्टिंक्शन प्राप्त की थी। इसके अलावा, उसने 'एलिमेंट्री एजुकेशन' (प्रारंभिक शिक्षा) में डिप्लोमा पूरा किया और 'प्राइमरी स्कूल टीचर सिलेक्शन टेस्ट' भी पास किया। यह मानते हुए कि संज्ञान लेने का आदेश कानूनन टिक नहीं सकता, अदालत ने याचिका स्वीकार की और FIR रद्द की।
Case Title : RA v State of MP