बंटवारा कार्यवाही में मालिकाना हक का फैसला नहीं कर सकते राजस्व अधिकारी: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-05-30 08:59 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि राजस्व अधिकारी बंटवारा कार्यवाही के दौरान भूमि के मालिकाना हक से जुड़े विवादों का निपटारा नहीं कर सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति राजस्व अभिलेखों में भूमिस्वामी के रूप में दर्ज नहीं है, लेकिन स्वयं को भूमि का सह-स्वामी या भूमिस्वामी बताता है, उसे अपने अधिकार की घोषणा के लिए सक्षम दीवानी अदालत का दरवाजा खटखटाना होगा।

जस्टिस दीपक खोत की पीठ ने यह टिप्पणी याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें राजस्व मंडल और तहसीलदार के आदेशों को चुनौती दी गई।

मामला मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 178 से संबंधित था, जो संयुक्त रूप से स्वामित्व वाली कृषि भूमि के बंटवारे की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है। इस प्रावधान के तहत तहसीलदार को कृषि भूमि के बंटवारे का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार केवल राजस्व क्षेत्राधिकार की सीमाओं तक ही सीमित है।

विवाद तब उत्पन्न हुआ, जब शुभकरण वैश्य नामक व्यक्ति ने कृषि भूमि में अपने हिस्से का दावा करते हुए बंटवारे के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। याचिकाकर्ता शिव कुमार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि शुभकरण राजस्व अभिलेखों में भूमिस्वामी के रूप में दर्ज नहीं हैं, इसलिए उन्हें तहसीलदार के समक्ष बंटवारे की कार्यवाही शुरू करने का अधिकार नहीं है।

शुरुआत में तहसीलदार ने मामले में दीवानी मुकदमा दायर करने का अवसर देने के लिए कार्यवाही तीन महीने के लिए स्थगित की थी। बाद में तहसीलदार ने पुनः सुनवाई करते हुए बंटवारे का आवेदन स्वीकार कर लिया। हालांकि, अपीलीय प्राधिकारी और अतिरिक्त आयुक्त ने इस आदेश को निरस्त किया। इसके बाद राजस्व मंडल ने तहसीलदार का आदेश बहाल किया, जिसके खिलाफ हाइकोर्ट में याचिका दायर की गई।

सुनवाई के दौरान प्रतिवादी की ओर से दलील दी गई कि धारा 178 में केवल "भूमिस्वामी" शब्द का प्रयोग किया गया, "दर्ज भूमिस्वामी" का नहीं। इसलिए कोई भी व्यक्ति जो स्वयं को भूमिस्वामी बताता है, बंटवारे की कार्यवाही शुरू कर सकता है।

हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति राजस्व रिकॉर्ड में भूमिस्वामी के रूप में दर्ज नहीं है और फिर भी स्वामित्व का दावा करता है, तो यह मूल रूप से मालिकाना हक का विवाद है, जिसका निर्णय राजस्व अधिकारी नहीं कर सकते।

अदालत ने कहा,

"जब कोई व्यक्ति भूमि में हिस्सेदारी पाने के लिए अपने स्वामित्व का दावा करता है, तब इस दावे के समर्थन में साक्ष्य और प्रमाणों की जांच आवश्यक होती है। ऐसे विवाद का निपटारा केवल दीवानी अदालत ही कर सकती है, राजस्व अधिकारी नहीं।"

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के भूमिस्वामी न होने का दावा करने वाले पक्ष को नकारात्मक घोषणा के लिए दीवानी मुकदमा दायर करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। बल्कि स्वामित्व का दावा करने वाले व्यक्ति को ही अपने अधिकार साबित करने के लिए दीवानी अदालत जाना होगा।

अदालत ने माना कि तहसीलदार ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बंटवारे का आवेदन स्वीकार किया और राजस्व मंडल ने भी उस आदेश की पुष्टि कर गलती की।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने तहसीलदार और राजस्व मंडल के आदेशों को निरस्त कर दिया तथा अपीलीय प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश बरकरार रखा। इसके साथ ही याचिका का निस्तारण किया गया।

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