बरी होने के बाद जब्ती आदेश नहीं रह सकता प्रभावी, संपत्ति की जब्ती नागरिक अधिकारों पर गंभीर असर डालती है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-06-20 07:09 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि जब किसी आरोपी को सक्षम अदालत आपराधिक मामले में बरी कर देती है तो मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम, 1915 की धारा 47ए के तहत कलेक्टर द्वारा पारित जब्ती आदेश स्वतंत्र रूप से प्रभावी नहीं रह सकता। अदालत ने कहा कि संपत्ति की जब्ती नागरिक के संवैधानिक और संपत्ति संबंधी अधिकारों पर गंभीर प्रभाव डालती है, इसलिए आरोप सिद्ध न होने की स्थिति में ऐसे आदेश को जारी रखना कानूनसम्मत नहीं है।

जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की पीठ ने भिंड कलेक्टर द्वारा 22 जनवरी 2025 को पारित वाहन जब्ती आदेश को रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया।

मामला एक वाहन मालिक की याचिका से जुड़ा था, जिसके वाहन को अवैध शराब परिवहन के आरोप में जब्त कर लिया गया। उसके खिलाफ मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत मामला दर्ज किया गया। बाद में सक्षम आपराधिक अदालत ने सुनवाई के बाद उसे बरी कर दिया, क्योंकि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जब अदालत ने अपराध सिद्ध नहीं माना और उसे बरी कर दिया, तब उसके वाहन की जब्ती जारी रखना मनमाना और असंवैधानिक है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 300ए के तहत प्राप्त समानता और संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन है।

वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि धारा 47ए के तहत चलने वाली जब्ती की कार्यवाही आपराधिक मुकदमे से स्वतंत्र होती है और कलेक्टर उपलब्ध सामग्री के आधार पर वाहन जब्त कर सकता है। राज्य ने तर्क दिया कि आपराधिक मामले में बरी होने मात्र से जब्ती आदेश स्वतः समाप्त नहीं हो जाता।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि जब्ती आदेश का आधार वही आरोप थे जिनकी जांच आपराधिक अदालत कर रही थी। अंतिम रूप से यह तय करने का अधिकार कि अपराध हुआ है या नहीं, केवल सक्षम अदालत के पास है, न कि कलेक्टर के पास।

अदालत ने कहा,

"बरी किए जाने के फैसले से स्पष्ट है कि अभियोजन धारा 34(2) के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। जब सक्षम आपराधिक अदालत ने पूर्ण सुनवाई के बाद अभियोजन के मामले को दोषसिद्धि के लिए अपर्याप्त पाया, तब वह आधार ही समाप्त हो जाता है जिस पर जब्ती आदेश टिका हुआ था।"

पीठ ने आगे कहा कि संपत्ति की जब्ती कोई साधारण प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर नागरिक के संवैधानिक और स्वामित्व संबंधी अधिकारों पर पड़ता है। इसलिए ऐसी कार्रवाई केवल विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही की जा सकती है और मात्र आरोपों के आधार पर नहीं टिक सकती, खासकर तब जब वे आरोप न्यायिक जांच में असफल साबित हो चुके हों।

अदालत ने कहा,

"याचिकाकर्ता के बरी होने के बावजूद जब्ती आदेश को जारी रखना ऐसे दंडात्मक परिणाम को बनाए रखने जैसा होगा, जिसके पीछे कोई विधिसम्मत रूप से सिद्ध अपराध मौजूद नहीं है। यह मनमाना होगा और संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित निष्पक्षता के सिद्धांतों के विपरीत होगा।"

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने भिंड कलेक्टर द्वारा पारित वाहन जब्ती आदेश को कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण बताते हुए रद्द किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब आपराधिक आरोप न्यायिक जांच में टिक नहीं पाए तो उन्हीं आरोपों के आधार पर संपत्ति की जब्ती को बनाए नहीं रखा जा सकता।

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