पुराने सरकारी अभिलेख गायब होने भर से किसी को संपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि केवल इस आधार पर किसी नागरिक को उसकी संपत्ति के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता कि पुराने सरकारी अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं या खो गए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति या संस्था का नाम दशकों से सरकारी राजस्व अभिलेखों में दर्ज है, तो उसे अवैध बताने का भार राज्य पर है और इसे ठोस तथा विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करना होगा।
जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की पीठ ने कहा,
“केवल सरकारी अभिलेखों का गायब होना या उपलब्ध न होना किसी नागरिक को उसके संपत्ति अधिकारों से वंचित करने का वैध आधार नहीं हो सकता। अवैधता, हेरफेर या गलत प्रविष्टियों के आरोप साबित करने का दायित्व राज्य पर है और इसे विश्वसनीय तथा स्वीकार्य साक्ष्यों के माध्यम से सिद्ध किया जाना चाहिए।”
अदालत ने यह भी कहा कि संविधान का अनुच्छेद 300ए प्रत्येक व्यक्ति को संपत्ति के अधिकार की सुरक्षा प्रदान करता है और किसी को भी विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
मामला एक पंजीकृत शैक्षणिक संस्था से जुड़ा था, जिसने विद्यालयों, हॉस्टल तथा अनुसूचित जाति और जनजाति के विद्यार्थियों के लिए आवासीय सुविधाएं स्थापित करने हेतु राज्य सरकार से भूमि आवंटन का अनुरोध किया था।
राज्य सरकार ने 17 अगस्त 1976 को दतिया जिले में पांच हेक्टेयर भूमि आवंटित की थी।
भूमि आवंटन के बाद संस्था का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज कर लिया गया और वह लगातार भूमि पर कब्जे एवं स्वामित्व के रूप में दर्ज रही। हालांकि कई दशक बाद पटवारी की एक रिपोर्ट के आधार पर यह दावा किया गया कि संबंधित भूमि पुराने अभिलेखों में जंगल के रूप में दर्ज थी और बाद में राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव हुए।
इसके बाद तहसीलदार ने कार्रवाई शुरू की और अंततः संस्था को भूमि से बेदखल करने तथा उस पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाने का आदेश पारित कर दिया।
हाईकोर्ट ने पाया कि पूरी कार्यवाही गंभीर प्रक्रियागत खामियों से ग्रस्त थी। अदालत ने कहा कि तहसीलदार ने बिना उचित जांच किए आदेश पारित कर दिया। न तो कोई साक्ष्य दर्ज किया गया, न गवाहों से पूछताछ हुई और न ही संस्था को अपने पक्ष में प्रभावी ढंग से साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया।
पीठ ने कहा,
“केवल पटवारी की रिपोर्ट के आधार पर निष्कर्ष निकालना, जिसकी न तो पुष्टि हुई और न ही उसकी जांच-पड़ताल की गई, गंभीर प्रक्रियागत त्रुटि है। ऐसे अप्रमाणित दस्तावेज के आधार पर किसी व्यक्ति या संस्था के लंबे समय से चले आ रहे राजस्व अधिकार और कब्जे को समाप्त नहीं किया जा सकता।”
अदालत ने यह भी कहा कि तहसीलदार ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर स्वामित्व और संपत्ति संबंधी विवादों पर फैसला दिया, जबकि राजस्व संहिता की संबंधित धाराएं उन्हें ऐसा अधिकार नहीं देतीं।
पीठ ने पाया कि संबंधित अवधि के मूल अभिलेख उपलब्ध नहीं थे। ऐसे में केवल अभिलेखों के अभाव के आधार पर यह मान लेना कि भूमि का आवंटन अवैध था, कानूनन स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने कहा कि जब राज्य का दावा था कि भूमि सरकारी है, तब यह साबित करने की जिम्मेदारी भी राज्य की ही थी। लेकिन राज्य ने अपना दायित्व निभाने के बजाय संस्था पर ही अपनी वैधता साबित करने का बोझ डाल दिया, जो कानून के विपरीत है।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि संस्था को पर्याप्त सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया और न ही अपने पक्ष में साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति मिली।
अदालत ने कहा,
“ऐसा कोई भी आदेश, जिसके नागरिक परिणाम हों और जो मूल्यवान संपत्ति अधिकारों को प्रभावित करता हो, निष्पक्ष प्रक्रिया और प्रभावी सुनवाई के बाद ही पारित किया जा सकता है। वर्तमान मामले में यह आवश्यकता पूरी तरह अनुपस्थित रही।”
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए तहसीलदार सहित राजस्व अधिकारियों द्वारा पारित सभी विवादित आदेशों को रद्द किया।