साइबर ठगी में हर सेकंड अहम: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा- पुलिस, बैंक और दूरसंचार विभाग के बीच तुरंत समन्वय जरूरी

Update: 2026-07-15 08:09 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने साइबर अपराधों की जांच को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में हर सेकंड अहम होता है और जांच एजेंसियों को अपराधियों से अधिक तेज़ी से काम करना होगा। कोर्ट ने कहा कि जब तक सूचना जुटाने, तकनीकी जांच और मैदानी कार्रवाई के बीच समन्वित व्यवस्था नहीं होगी, तब तक समय पर अपराध का खुलासा और धन की बरामदगी मुश्किल रहेगी।

जस्टिस हिमांशु जोशी की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय, दूरसंचार विभाग और भारतीय रिजर्व बैंक को पक्षकार बनाने की अनुमति दी। साथ ही पश्चिम बंगाल, झारखंड और असम के पुलिस महानिदेशकों को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा,

"साइबर अपराधों में जांच एजेंसियों को अपराधियों से अधिक तेजी से काम करना होगा। सूचना संग्रह, तकनीकी विश्लेषण और मैदानी जांच को एक समर्पित एवं समन्वित व्यवस्था के तहत नहीं लाया गया तो त्वरित जांच और धन की बरामदगी का उद्देश्य विफल हो जाएगा।"

मामला एक रिटायर बैंक प्रबंधक की याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने आरोप लगाया कि उनके बैंक खाते से बिना अनुमति 6.24 लाख रुपये की राशि आईएमपीएस के जरिए निकाल ली गई।

याचिकाकर्ता के अनुसार, 27 अप्रैल, 2024 को मोबाइल बैंकिंग का उपयोग करने के दौरान उन्हें पता चला कि कई बार गलत लॉगिन प्रयास होने के कारण उनका खाता बंद हो गया। जांच करने पर उन्होंने पाया कि उनके बचत खाते से दो अनधिकृत लेनदेन किए गए।

उन्होंने तत्काल इंटरनेट और मोबाइल बैंकिंग सेवाएं बंद कराईं, बैंक शाखा प्रबंधक को शिकायत दी, बैंक के उच्च अधिकारियों से संपर्क किया और राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद FIR दर्ज हुई, लेकिन काफी समय बीत जाने के बावजूद पुलिस ने सक्षम अदालत में अंतिम रिपोर्ट पेश नहीं की।

याचिकाकर्ता का कहना था कि यह देरी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 193 के प्रावधानों के विपरीत है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि जांच जारी है और आरोपियों तक पहुंचने के लिए सभी आवश्यक तकनीकी और कानूनी कदम उठाए जा रहे हैं।

जबलपुर के पुलिस अधीक्षक ने कोर्ट को बताया कि शिकायत मिलते ही मामला साइबर प्रकोष्ठ को भेजा जाता है। इसके बाद विभिन्न बैंकों की नोडल एजेंसियों से जानकारी मांगी जाती है। चूंकि प्रत्येक बैंक की अलग नोडल एजेंसी होती है, इसलिए शुरुआती जानकारी मिलने में ही तीन से पांच दिन लग जाते हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि दूसरे राज्यों से जानकारी प्राप्त करने में भी कई बार अपेक्षित सहयोग नहीं मिलता। इसके अलावा साइबर ठग निर्दोष लोगों के नाम पर खोले गए बैंक अकाउंट्स का इस्तेमाल करते हैं और टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड माध्यमों से संपर्क में रहते हैं। उनकी पहचान के लिए आईपी लॉग, ग्राहक विवरण और अन्य तकनीकी जानकारी जुटानी पड़ती है, जिसमें काफी समय लगता है। इस दौरान आरोपी लगातार स्थान बदलते रहते हैं, धन को कई खातों में स्थानांतरित कर देते हैं और डिजिटल साक्ष्य भी मिटा देते हैं।

कोर्ट ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था, जिसमें जानकारी अलग-अलग एजेंसियों से होकर गुजरती है, जांच में अनावश्यक देरी का कारण बनती है और इसका सीधा लाभ अपराधियों को मिलता है।

इसी को देखते हुए हाईकोर्ट ने गृह मंत्रालय, दूरसंचार विभाग और भारतीय रिजर्व बैंक को पक्षकार बनाने की अनुमति दी। साथ ही पश्चिम बंगाल, झारखंड और असम के पुलिस महानिदेशकों को 21 जुलाई, 2026 को होने वाली अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपने-अपने राज्यों में की गई जांच की विस्तृत स्थिति रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया।

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