मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि पुलिस अधीक्षक को सब इंस्पेक्टर और असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने, संयुक्त जांच कराने और वेतनवृद्धि रोकने जैसी सजा देने का अधिकार है।

जस्टिस दीपक खोट की पीठ ने कहा कि मध्य प्रदेश पुलिस विनियम के विनियम 221 के तहत पुलिस अधीक्षक को यह अधिकार प्राप्त है।

यह मामला पुलिस विभाग में सब इंस्पेक्टर के पद पर वर्ष 1983 में सेवा शुरू करने वाले लज्जा शंकर मिश्रा से जुड़ा था। वह आगे चलकर इंस्पेक्टर और फिर डिप्टी पुलिस अधीक्षक के पद तक पहुंचे। छतरपुर थाने में पदस्थापना के दौरान वर्ष 2006 में उनके और असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ संयुक्त आरोपपत्र जारी किया गया।

विभागीय जांच में मिश्रा के खिलाफ लगाए गए चार आरोपों में से तीन आरोप साबित नहीं हुए, जबकि एक आरोप आंशिक रूप से साबित पाया गया। वहीं असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर के खिलाफ लगाए गए आरोप भी सही नहीं पाए गए। इसके बाद पुलिस अधीक्षक ने मिश्रा की वेतनवृद्धि संचयी प्रभाव से रोकने की सजा दी जबकि असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर को आरोपों से मुक्त कर दिया।

मिश्रा ने इस आदेश को पुलिस उपमहानिरीक्षक के समक्ष चुनौती दी, लेकिन मार्च 2008 में उनकी अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने पुलिस महानिरीक्षक के समक्ष अभ्यावेदन दिया और कहा कि उनके आवेदन को पुनर्विचार याचिका के रूप में माना जाना चाहिए। हालांकि इसे इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि दूसरी अपील सुनवाई योग्य नहीं है।

मिश्रा की ओर से हाईकोर्ट में मुख्य रूप से दलील दी गई कि पुलिस अधीक्षक को सजा देने का अधिकार नहीं था। उनका कहना था कि मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियम, 1996 से जुड़े प्रावधानों के अनुसार सब इंस्पेक्टर और असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर के नियुक्ति प्राधिकारी पुलिस उपमहानिरीक्षक हैं। ऐसे में पुलिस अधीक्षक बड़ी सजा नहीं दे सकते।

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि पुलिस महानिरीक्षक के पास पुनर्विचार की शक्ति है। मध्य प्रदेश पुलिस विनियम के विनियम 270 के तहत पुलिस महानिरीक्षक स्वयं भी पुनरीक्षण शुरू कर सकते हैं और पीड़ित कर्मचारी के आवेदन पर भी मामले की जांच कर सकते हैं। इसलिए उनके अभ्यावेदन को दूसरी अपील मानकर खारिज करने के बजाय पुनरीक्षण के रूप में विचार किया जाना चाहिए।

संयुक्त विभागीय जांच को लेकर भी याचिकाकर्ता ने नियम 18 का हवाला देते हुए कहा कि इसके लिए राज्यपाल की पूर्व अनुमति आवश्यक थी।

हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि वर्ष 1996 के नियमों से जुड़े प्रावधानों में श्रेणी तीन के पदों, जिनमें सब इंस्पेक्टर और असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर शामिल हैं, को पुलिस विनियमों के तहत रखा गया। इसलिए वर्ष 1996 के नियम इन पदों पर लागू नहीं होते।

पीठ ने मध्य प्रदेश पुलिस विनियम के विनियम 214 से 217 और 221 का उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिस अधीक्षक को सब इंस्पेक्टर और असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर के खिलाफ निर्धारित दंड देने का अधिकार है। विनियम 214 के तहत वेतनवृद्धि रोकने की सजा भी पुलिस अधीक्षक द्वारा दी जा सकती है।

हाईकोर्ट ने कहा,

“विनियम 221 के तहत पुलिस अधीक्षक को विभागीय जांच शुरू करने और विनियम 214 में दिए गए दंड को देने का अधिकार है।”

राज्यपाल की पूर्व अनुमति के तर्क को भी कोर्ट ने खारिज किया। पीठ ने कहा कि पुलिस विनियम के विनियम 221 में पुलिस अधीक्षक को विभागीय जांच शुरू करने और निर्धारित दंड देने की स्पष्ट शक्ति दी गई। इसलिए इस आधार पर भी याचिकाकर्ता को राहत नहीं दी जा सकती।

इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाएं खारिज कीं और पुलिस अधीक्षक द्वारा की गई विभागीय कार्रवाई तथा दी गई सजा को अधिकार क्षेत्र के भीतर माना।

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