आरोपी को चार्जशीट के खिलाफ विरोध याचिका दायर करने का वैधानिक अधिकार नहीं, आरोपमुक्ति की दलील ही उपलब्ध उपाय: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि जांच एजेंसी किसी मामले में आरोपपत्र दाखिल करती है तो आरोपी को उसके खिलाफ विरोध याचिका दायर कर आरोप तय होने से पहले लघु सुनवाई कराने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में आरोपी के पास उपलब्ध कानूनी उपाय केवल आरोपमुक्ति की मांग करना है।
जस्टिस जय कुमार पिल्लई ने शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने और अश्लीलता के आरोपों में आरोप तय करने के आदेश को चुनौती देने वाली पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
अदालत ने कहा,
"जब जांच एजेंसी सकारात्मक आरोपपत्र दाखिल करती है, तब आरोपी को विरोध याचिका दायर कर आरोप तय होने से पहले लघु सुनवाई की मांग करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। इस स्तर पर आरोपी का उपाय केवल रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर आरोपमुक्ति की मांग करना है।"
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विरोध याचिका का प्रावधान मुख्य रूप से उन मामलों में लागू होता है, जहां मजिस्ट्रेट पुलिस की अंतिम रिपोर्ट स्वीकार कर कार्यवाही समाप्त करने का विचार करता है। ऐसी स्थिति में मूल शिकायतकर्ता को नोटिस देकर उसका पक्ष सुनना अनिवार्य होता है।
मामले में एक महिला ने आरोप लगाया कि पीथमपुर में नौकरी के दौरान उसकी मुलाकात आरोपी से हुई, जिसने उससे शादी का वादा किया। महिला का कहना था कि शादी का भरोसा दिलाकर आरोपी ने उससे कई बार शारीरिक संबंध बनाए और उसके दूसरे स्थान पर चले जाने के बाद भी उसे इंदौर बुलाता रहा।
महिला ने आरोप लगाया कि 27 अक्टूबर 2025 को आरोपी ने फोन पर शादी से इनकार किया, जिसके बाद उसने शिकायत दर्ज कराई।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने 12 दिसंबर 2025 को आरोपपत्र दाखिल करते हुए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनना बताया। बाद में मजिस्ट्रेट ने आरोपपत्र पर संज्ञान ले लिया।
इसके बाद आरोपी ने आरोपपत्र और संज्ञान आदेश को चुनौती देते हुए विरोध याचिका दायर की। हालांकि अगले ही दिन ट्रायल कोर्ट ने उसके खिलाफ BNS की धारा 69 और धारा 296 के तहत आरोप तय कर दिए।
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि उसकी विरोध याचिका पर आदेश सुरक्षित रख लिया गया, लेकिन उस पर फैसला सुनाने के बजाय ट्रायल कोर्ट ने सीधे आरोप तय कर दिए। साथ ही यह भी कहा गया कि पुलिस ने केवल धारा 69 का आरोप लगाया, जबकि अदालत ने बिना पर्याप्त आधार के धारा 296 भी जोड़ दी।
वहीं, राज्य सरकार ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री आरोप तय करने के लिए पर्याप्त है।
हाईकोर्ट ने कहा कि पुनरीक्षण का अधिकार सीमित है और इसका उद्देश्य केवल अधिकार क्षेत्र की त्रुटि, कानून की स्पष्ट गलती या ऐसी प्रक्रिया संबंधी खामी को सुधारना है, जिससे न्याय में गंभीर विफलता हुई हो।
अदालत ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी की ओर से रखी गई आरोपमुक्ति की दलीलों और अभियोजन पक्ष के तर्कों पर विचार करने के बाद ही यह निष्कर्ष निकाला था कि धारा 69 और धारा 296 के तहत आरोप तय करने के लिए पर्याप्त प्रथम दृष्टया सामग्री उपलब्ध है।
हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी की तथाकथित विरोध याचिका में उठाए गए तर्क वास्तव में आरोपमुक्ति की मांग से जुड़े थे। ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय किया जाना इस बात का संकेत है कि उसने आरोपी की आरोपमुक्ति की मांग को अस्वीकार कर दिया था।
अदालत ने यह भी माना कि विरोध याचिका पर अलग से आदेश पारित न करने से पूरी कार्यवाही अवैध नहीं हो जाती और इससे न्याय में कोई विफलता भी नहीं हुई।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने आरोपी की पुनरीक्षण याचिका खारिज की।