मां के नौकरीपेशा होने से नाबालिग संतान के भरण-पोषण से पिता मुक्त नहीं, आय केवल राशि तय करने का आधार: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-07-23 09:39 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मां के नौकरीपेशा होने या नाबालिग संतान के उसके साथ रहने मात्र से पिता की भरण-पोषण की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। अदालत ने कहा कि मां की आय केवल भरण-पोषण की राशि तय करने में एक प्रासंगिक पहलू हो सकती है, लेकिन इससे पिता का कानूनी दायित्व स्वतः खत्म नहीं होता।

जस्टिस पुष्पेन्द्र यादव की पीठ ने फैमिली कोर्ट का वह अंतरिम आदेश बरकरार रखा, जिसमें नाबालिग बेटी को 6,000 रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था, जबकि मां को अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया गया था। अदालत ने माना कि मां आयुर्वेद विभाग में सरकारी कर्मचारी है और अपने भरण-पोषण में सक्षम है।

अदालत ने कहा,

"पिता होने के नाते याचिकाकर्ता पर अपनी नाबालिग संतान का भरण-पोषण करने का दायित्व है। यह जिम्मेदारी केवल इसलिए समाप्त नहीं हो जाती कि मां कहीं कार्यरत है और संतान उसके साथ रह रही है।"

मामला वर्ष 2010 में हुए विवाह से जुड़ा है। दंपति की एक बेटी है। पत्नी ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग करते हुए आरोप लगाया कि दहेज की मांग को लेकर उसके साथ प्रताड़ना की गई, जिसके कारण 29 अक्तूबर 2019 को उसे वैवाहिक घर छोड़ना पड़ा।

फैमिली कोर्ट ने पाया कि पत्नी आयुर्वेद विभाग में कंपाउंडर के पद पर कार्यरत है और उसे प्रतिमाह 39,368 रुपये वेतन मिलता है। इसी आधार पर उसे अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया गया, जबकि नाबालिग बेटी के लिए 6,000 रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण मंजूर किया गया। इस आदेश को पति और पत्नी दोनों ने चुनौती दी।

पिता की ओर से दलील दी गई कि वह सेना से सेवानिवृत्त हैं और केवल पेंशन पर निर्भर हैं। साथ ही वह अपने वृद्ध माता-पिता के भरण-पोषण पर हर महीने 16,000 रुपये खर्च करते हैं। इसलिए बेटी के लिए तय की गई अंतरिम भरण-पोषण की राशि अधिक है। यह भी कहा गया कि मां स्वयं सरकारी नौकरी करती है और बेटी का खर्च उठाने में सक्षम है।

वहीं, मां और बेटी की ओर से कहा गया कि 6,000 रुपये की राशि बेटी की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त नहीं है। साथ ही यह तर्क भी दिया गया कि केवल नौकरी करने के आधार पर मां को भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरिम भरण-पोषण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतिम निर्णय होने तक संबंधित पक्ष जीवन-यापन के साधनों से वंचित न रहे। इस स्तर पर अदालत केवल प्रथमदृष्टया उपलब्ध तथ्यों के आधार पर राय बनाती है। ऐसे आदेश में तभी हस्तक्षेप किया जा सकता है, जब वह मनमाना, विधि के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत या स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण हो।

पीठ ने माना कि फैमिली कोर्ट ने मां की आय, पिता की पेंशन और उनके अन्य आर्थिक दायित्वों को ध्यान में रखते हुए अंतरिम आदेश पारित किया है। इसलिए इस स्तर पर उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल मां के नौकरीपेशा होने से वह भरण-पोषण मांगने के अधिकार से स्वतः वंचित नहीं हो जाती। अंतिम सुनवाई के दौरान फैमिली कोर्ट दोनों पक्षों की वास्तविक आय, आवश्यकताओं और साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण कर अंतिम फैसला करेगा।

इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट का अंतरिम आदेश बरकरार रखा।

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