एक बार की प्रतिकूल टिप्पणी से वकील को हमेशा के लिए नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी वकील के खिलाफ अतीत में दर्ज की गई एक बार की प्रतिकूल टिप्पणी उसे भविष्य में सरकारी विधि अधिकारी के पद पर नियुक्ति से हमेशा के लिए अयोग्य नहीं ठहरा सकती। अदालत ने कहा कि यदि सक्षम प्राधिकारी बाद में उसके कार्य का मूल्यांकन कर उसे उपयुक्त पाता है, तो उसकी नियुक्ति को केवल पुरानी प्रतिकूल टिप्पणियों के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता।
यह फैसला जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के ने सुनाया। अदालत ने सरकारी विधि अधिकारी के रूप में वकील की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की।
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता को वर्ष 2014 में अतिरिक्त शासकीय वकील एवं अतिरिक्त लोक अभियोजक नियुक्त किया गया। वर्ष 2016 में प्रतिकूल रिपोर्ट के आधार पर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं। बाद में उन्होंने इस कार्रवाई को चुनौती दी और अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज प्रतिकूल टिप्पणियों को हटा दिया।
इसी पद पर कार्यरत एक अन्य वकील (प्रतिवादी संख्या-3) को भी वर्ष 2016 में कार्य संतोषजनक नहीं पाए जाने के कारण पद से हटा दिया गया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि इस तथ्य का उल्लेख कलेक्टर की अनुशंसा में भी किया गया।
बाद में याचिकाकर्ता और प्रतिवादी संख्या-3 दोनों की दोबारा नियुक्ति हुई। इसके बाद वर्ष 2023 में राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश विधि विभाग मैनुअल के नियम 17(3) के तहत प्रतिवादी संख्या-3 को तीन वर्ष के नए कार्यकाल के लिए फिर नियुक्त कर दिया। इसी नियुक्ति को याचिकाकर्ता ने चुनौती दी।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि नियम 17(3) के तहत तीन वर्ष के नए कार्यकाल की नियुक्ति का अधिकार नहीं है और ऐसी नियुक्ति केवल नियम 19 के अनुसार जिला एवं सत्र जज से परामर्श के बाद ही की जा सकती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रतिवादी संख्या-3 की नियुक्ति तत्कालीन विधि मंत्री की इच्छा पूरी करने के लिए की गई।
वहीं, राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि नियुक्ति कलेक्टर की अनुशंसा और जिला एवं सत्र जज से परामर्श के बाद निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए की गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का मुख्य आधार वर्ष 2016 की प्रतिकूल टिप्पणियां थीं, लेकिन सक्षम प्राधिकारी ने उन्हें स्थायी अयोग्यता नहीं माना। अदालत ने कहा कि प्रतिवादी संख्या-3 को वर्ष 2021 में दोबारा नियुक्त किया गया, उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया और उसके बाद सक्षम अधिकारियों ने उन्हें फिर से नियुक्ति के लिए उपयुक्त माना।
अदालत ने कहा,
"केवल इसलिए कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कभी प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज हुईं, उसे भविष्य की नियुक्तियों से हमेशा के लिए वंचित नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब सक्षम प्राधिकारी बाद में उसके कार्य का मूल्यांकन कर उसे उपयुक्त पाए।"
हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि लोक अभियोजक और अतिरिक्त लोक अभियोजक की नियुक्ति एक पेशेवर नियुक्ति है, जिसमें चयन का अधिकार मुख्य रूप से राज्य सरकार के पास होता है। अदालत तभी हस्तक्षेप कर सकती है, जब नियुक्ति कानून के स्पष्ट उल्लंघन, दुर्भावना या स्पष्ट मनमानेपन से प्रभावित हो।
साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को यह अपेक्षा भी जताई कि भविष्य में नई नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति करते समय मध्य प्रदेश विधि विभाग मैनुअल के सभी प्रावधानों का पूरी तरह पालन किया जाए, ताकि नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता बनी रहे।
तत्कालीन विधि मंत्री की इच्छा पूरी करने के लिए नियुक्ति किए जाने के आरोपों पर अदालत ने कहा कि इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया। केवल आरोपों के आधार पर नियुक्ति को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
इन सभी तथ्यों को देखते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका खारिज की।