अर्द्ध-न्यायिक कार्य करने वाले तहसीलदार को जजों जैसा कानूनी संरक्षण मिलेगा, पेंशन रोकने का आदेश रद्द: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-07-15 13:45 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मुरैना के रिटायर संयुक्त कलेक्टर की याचिका स्वीकार करते हुए उनकी पेंशन पर लगाई गई रोक को रद्द किया।

कोर्ट ने कहा कि अर्द्ध-न्यायिक कार्य करने वाले तहसीलदार को जजों की तरह कानूनी संरक्षण प्राप्त है, इसलिए अपने न्यायिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों के लिए उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती, जब तक दुर्भावना या गंभीर कदाचार सिद्ध न हो।

जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की पीठ ने कहा कि मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता के तहत अधिकारों का प्रयोग करने वाला तहसीलदार जज संरक्षण अधिनियम, 1985 के तहत मिलने वाले संरक्षण का हकदार है।

कोर्ट ने कहा,

"तहसीलदार अपने न्यायिक या आधिकारिक दायित्वों के निर्वहन के दौरान किए गए किसी कार्य, आदेश या कथन के लिए जज संरक्षण अधिनियम, 1985 की धारा 3(1) के तहत संरक्षित है।"

मामला वर्ष 2001-02 का है जब याचिकाकर्ता डबरा में तहसीलदार के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने राजस्व पुस्तिका परिपत्र के प्रावधानों के तहत दो व्यक्तियों के पक्ष में सरकारी पट्टे का आदेश पारित किया। बाद में कलेक्टर ने उस आदेश को निरस्त कर उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की।

याचिकाकर्ता को रिटायमेंट से कुछ महीने पहले जांच का नोटिस दिया गया। रिटायरमेंट से ठीक एक दिन पहले आरोप-पत्र जारी किया गया और बाद में विभागीय जांच के आधार पर उनकी दो वर्ष के लिए 10 प्रतिशत पेंशन रोकने की सजा दी गई।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप कदाचार की श्रेणी में नहीं आते। साथ ही, तहसीलदार के रूप में अर्द्ध-न्यायिक दायित्व निभाने के कारण उन्हें जज संरक्षण अधिनियम का लाभ मिलना चाहिए।

हाईकोर्ट ने पाया कि विभागीय जांच के दौरान मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की राय याचिकाकर्ता को उपलब्ध नहीं कराई गई और न ही उन्हें उस पर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया।

कोर्ट ने कहा कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। साथ ही जांच से संबंधित आवश्यक दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं कराए गए जिससे पूरी विभागीय कार्रवाई ही दोषपूर्ण हो गई।

कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता ने अपने अर्द्ध-न्यायिक अधिकारों का प्रयोग किसी दुर्भावना या गलत मंशा से किया। इसलिए उनके कार्य को कदाचार नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पेंशन रोकने जैसी कठोर सजा तभी दी जा सकती है जब गंभीर कदाचार का स्पष्ट और ठोस निष्कर्ष दर्ज हो। चूंकि इस मामले में ऐसा नहीं था इसलिए पेंशन रोकने का आदेश टिक नहीं सकता।

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