यौन उत्पीड़न शिकायतकर्ता को 35 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश रद्द, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा- पहले अपील पर हो फैसला

Update: 2026-07-02 11:13 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़े मामले में लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा संस्थान (LNPEI) के कुलपति को योग प्रशिक्षक को 35 लाख रुपये मुआवजा देने का एकल पीठ का आदेश रद्द किया।

अदालत ने कहा कि जब आंतरिक शिकायत समिति (ICC) की रिपोर्ट के खिलाफ कुलपति की विभागीय अपील अभी लंबित है तब मुआवजे का आदेश देना उचित नहीं है।

जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस आशीष श्रोती की खंडपीठ ने कहा कि अपील का अधिकार एक मौलिक वैधानिक अधिकार है और पहले विभागीय अपीलीय प्राधिकारी को मामले में उठाए गए सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार कर निर्णय लेना चाहिए।

अदालत ने कहा,

"सबसे पहले विभागीय अपीलीय प्राधिकारी अपील में उठाए गए सभी तर्कों और उनके जवाब पर विचार कर तार्किक एवं उचित निर्णय ले। इससे मामले के तथ्य और दोनों पक्षों द्वारा उठाए गए विवादित मुद्दों की विस्तार से जांच हो सकेगी क्योंकि अपील का अधिकार एक महत्वपूर्ण वैधानिक अधिकार है।"

मामले के अनुसार संस्थान में कार्यरत एक योग प्रशिक्षक ने मार्च 2019 में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संरक्षण कानून के तहत शिकायत दर्ज कराई।

शिकायत के आधार पर आंतरिक शिकायत समिति ने जांच की और अपनी रिपोर्ट में कुलपति के खिलाफ कथित कदाचार के निष्कर्ष दर्ज किए। इसके बाद कुलपति ने विभागीय अपील दायर की जो अब भी लंबित है। इस बीच उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई।

उधर, योग प्रशिक्षक ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कुलपति और राज्य सरकार से मुआवजे सहित विभिन्न राहतों की मांग की थी।

एकल पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए कुलपति को 35 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था।

साथ ही राज्य सरकार को FIR दर्ज नहीं करने और जांच में देरी के लिए पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी दिया गया। इसके अलावा संस्थान पर लापरवाहीपूर्ण रवैया अपनाने के लिए एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।

इस आदेश के खिलाफ कुलपति ने खंडपीठ में अपील दायर करते हुए कहा कि उनकी विभागीय अपील अभी विचाराधीन है। ऐसे में मुआवजा देने का आदेश उनके दोषी होने की पूर्वधारणा को मजबूत करेगा और उनके अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।

खंडपीठ ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि अपील का अधिकार प्रभावी रूप से इस्तेमाल होने दिया जाना चाहिए।

इसी आधार पर अदालत ने एकल पीठ का आदेश रद्द करते हुए मामले को दोबारा विभागीय अपीलीय प्राधिकारी के पास भेज दिया ताकि वह सभी पक्षों की दलीलों पर विचार कर विधि के अनुसार निर्णय ले सके।

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